कैवल्यपाद

कैवल्यपाद (पातञ्जलयोगप्रदीप – योगदर्शन) जन्म, ओषधि, मन्त्र, तप और समाधि से उत्पन्न होने वाली सिद्धियां हैं ||१|| एक जाती से दूसरी जाती में बदल जाना प्रकृतियों के भरने से होता है ||२|| धर्मादि निमित्त प्रकृतियों[…]

विभूतिपाद

विभूतिपाद (पातञ्जलयोगप्रदीप – योगदर्शन) चित्त का वृत्ति मात्र से किसी स्थान विशेष में बाँधना ‘धारणा’ कहलाता है ||१|| उसमें वृत्ति का एक-सा बना रहना ‘ध्यान’ है ||२|| वह ध्यान ही ‘समाधि’ कहलाता है, जब उसमें[…]

साधनपाद

साधनपाद (पातञ्जलयोगप्रदीप – योगदर्शन) तप , स्वाध्याय एवं ईश्वरप्रणिधान क्रिया योग है । यह समाधिभाव देता है एवं क्लेश को कमजोर बना देता है । अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष एवं अभिनिवेश – ये[…]

समाधिपाद

समाधिपाद (पातञ्जलयोगप्रदीप – योगदर्शन) अब योगानुशासन का प्रारम्भ करते हैं ॥ १ ॥ योग चित्त की वृत्ति का निरोध है ॥ २ ॥ उस समय द्रष्टा अपने रुप में स्थिर हो जाता है ॥ ३[…]

योग के भेद (प्रकार)

चित्त की वृत्तियों का रोकना योग है | साधकों के भेद से योग को निम्न श्रेणियों में विभक्त किया गया है – १. राज योग अर्थात ध्यान योग – पतंजलि योग दर्शन का मुख्य विषय[…]

योग दर्शन

योग दर्शन – योग दर्शन के आदि आचार्य हिरण्यगर्भ है | हिरण्यगर्भ – सूत्रों के आधार पर ( जो इस समय लुप्त है ) पतञ्जलि मुनि ने योग दर्शन का निर्माण किया | योगदर्शन के[…]

योग ( ज्ञान योग , उपासना योग और कर्मयोग ) का वास्तविक स्वरुप –

योग सांख्य का ही क्रियात्मक रूप है | योग सारे सम्प्रदायों और मत – मतान्तरों के पक्षपात और वाद- विवाद से रहित सार्वभौम धर्म है, जो तत्त्व का ज्ञान स्वयं अनुभव द्वारा प्राप्त करना सिखलाता[…]

सांख्यदर्शन

तत्त्वसमास सांख्यदर्शन – दुखों कि निवृत्ति का साधन तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान हैं | दुःख कि जड़ ज्ञान हैं | जितना अधिक ज्ञान होगा उतना ही अधिक दुःख होगा | जितना काम ज्ञान होगा उतना[…]

सांख्य दर्शन के मुख्य ग्रन्थ

सांख्य दर्शन के मुख्य ग्रन्थ – सांख्य के बहुत से प्राचीन ग्रन्थ ई समय लिप्त हैं | कई एक के केवल नाम ही मिलते है | १. कपिल मुनि प्रणीत ‘तत्त्वसमास’ – इसके वर्तमान समय[…]

सांख्य और योग दर्शन

सांख्य और योग दर्शन – परमात्मा ( चेतनतत्त्व) के निर्गुण शुद्ध स्वरुप का वर्णन उपनिषदों में विस्तारपूर्वक किया गया है, इसलिए उपनिषदों को वेदांत कहते है – ज्ञान का अन्त अर्थात जिसके जानने के बाद[…]

न्याय और वैशेषिक दर्शन का सिद्धांत

न्याय और वैशेषिक का सिद्धांत –  कार्य कारण किसी प्रयोजन के लिए बनी हुई वस्तु कार्य कहलाता है, जैसे वस्त्र |   बिना कारण के कोई कार्य नहीं हो सकता |   यह कारण तीन[…]

न्याय – दर्शन

न्याय – दर्शन – न्याय सूत्र के रचयिता का गोतम ( गोत्र नाम गोतम ) है और व्यक्तिगत नाम अक्षपाद है | विभिन्न प्रमाणों की सहायता से वस्तुतत्त्व की परीक्षा न्याय हैं | न्यायसूत्र पांच[…]

वैशेषिक दर्शन

वैशेषिक दर्शन – इस दर्शन का नाम कणाद और औलूक्य भी है | वैशेषिक का अर्थ है पदार्थों में भेदों का बोधक , और पदार्थ उसे कहते हैं जो प्रतीति से सिद्ध हो | विशेष[…]

उत्तरमीमांसा – (वेदांत दर्शन)

वेदांत दर्शन ( उत्तरमीमांसा )     उत्तरमीमांसा को ब्रह्मसूत्र , शारीरिक सूत्र , ब्रह्म मीमांसा तथा वेद का अंतिम तात्पर्य बतलाने से वेदान्तदर्शन और वेदांत मीमांसा भी कहते हैं |     वेदांत दर्शन[…]

पूर्व मीमांसा ( मीमांसा दर्शन )

  पूर्वमीमांसा श्री वेदव्यास जी के शिष्य जैमिनी मुनि ने प्रवृति मार्गी गृहस्थियों तथा कर्मकाण्डियों के लिए बनायी हैं | इसको जैमिनी दर्शन भी कहते हैं |     (पूर्व) मीमांसा के अनुसार धर्म की[…]

पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा अर्थात मीमांसा और वेदांत दर्शन

कर्मकाण्ड – वेदशास्त्रों में बतलायी हुई – कर्त्तव्य कर्मों अर्थात इष्ट और पूर्त्त कर्मों की – शिक्षा का नाम कर्मकाण्ड है |   इष्ट वे कर्म हैं, जिनकी विधि , मन्त्रों में दी गयी हो[…]

दर्शन: क्या हैं ?

दर्शन: – वेदों में बतलाये हुए ज्ञान की मीमांसा दर्शनशास्त्रों में मुनियों द्वारा सूत्र रूप में की गयी हैं |   दर्शन शब्द का अर्थ हैं ‘जिसके द्वारा देखा जाय’ अर्थात वस्तु का तात्त्विक स्वरुप[…]

वेद क्या हैं ?

वेद ईश्वरीय ज्ञान है, जिसका प्रादुर्भाव ऋषियों पर सृष्टि के आरम्भ में समाधी द्वारा होता है | १. मूल वेदमंत्र – इन मन्त्रों की चार संहिताएँ है, जो – ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और[…]