छ: दर्शनोंसे निराला दर्शन

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वे  महात्मा, क्या थे  महाराज ! मेरे मनसे अगर आप पूछो तो नये दार्शनिक थे! 

जैसे योग है, सांख्य है, पूर्व मीमांसा है, उत्तर मीमांसा है, न्याय है, छ: दर्शन है। छ: दर्शनोंसे निराला दर्शन है उनका। इतना किसने समझा है? किसने ख्याल किया है? बताओ । मैं ये बात बता सकता हूँ आपको ।

दार्शनिक, नये दार्शनिक !परन्तु किसका विश्वास है ?  

ज्ञानयोगमें, कर्मयोगमें, भक्तियोगमें विलक्षण बातें बतायी उन्होंने; उनकी बातें अकाट्य है; कोई खण्डन नहीं कर सकता उनकी बातोंका ।

आपके शास्त्र आपसमें खण्डन करते हैं एक-दूसरेका, मगर उनकी बातों का खण्डन करें कोई !

और प्रमाण देते नहीं हैं, किसी शास्त्र का, किसी पुस्तक का कोई प्रमाण नहीं।

उनसे कहा था कि प्रमाण क्यों नहीं देते ? उन्होंने कहा कि जिसे संदेह हो वे प्रमाण दें, मुझे संदेह ही नहीं तो प्रमाण क्यों दूं? प्रमाण कि क्या आवश्यकता है?   –   स्वामी श्रीरामसुखदासजी 

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महाराज जी के समान मैं मानता नहीं हूँ किसी संतको, मेरे हॄदयमें बात है ये। आपको राजी करना मेरे को है नहीं, क्योंकि आपसे कुछ लेना है नहीं, मेरे मनकी बात कोई पूछे तो शरणानन्दजी बहुत ऊँचे थे । महराजजी में बहुत सरलता है, परन्तु लोग समझते नहीं । प्रबोधनी में लिखा है “मैं क्रान्तिकारी संन्यासी हूँ, शास्त्रों में हलचल मच जाये, हलचल, ऐसी है । मेरी बातें ठीक समझे तो हलचल मच जायेगी सब दर्शनोंमें”। – स्वामी श्रीरामसुखदासजी 

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मेरी दृष्टि में बहुत अच्छे महात्मा हैं वो, मेरी दृष्टि में तो ऐसे हैं कि सबसे श्रेष्ठ महात्मा हैं। तत्वज्ञ, जीवनमुक्त महापुरुष जो पहले हो गये, उनमें भी कोई ऐसा दीखता नहीं, ऐसे विशेष हैं।–स्वामी श्रीरामसुखदासजी 

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