साधनपाद

साधनपाद (पातञ्जलयोगप्रदीप – योगदर्शन)

तप , स्वाध्याय एवं ईश्वरप्रणिधान क्रिया योग है ।

यह समाधिभाव देता है एवं क्लेश को कमजोर बना देता है ।

अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष एवं अभिनिवेश – ये क्लेश हैं ।

अविद्या का क्षेत्र – प्रसुप्त , तनु , विच्छिन्न एवं उदार होता है ।

इसमें अनित्य , अशुचि , दुख एवं अनात्म में नित्य , शुचि , सुख एवं आत्म दिखता है ।

अस्मिता दृग्दर्शन की शक्ति को एकात्मता के समान कर देता है ।

राग सुख का अनुशयी है ।

द्वेष दुख का अनुशयी है ।

अभिनिवेश अपने रस में स्थिर होता है, और विद्वानो में भी आरुढ है ।

सूक्ष्म रुप में उनकी उत्पत्ति समझने पर वो समाप्त हो जाती हैं ।

वो वृत्तियाँ ध्यान से कम हो जाती हैं ।

कर्माशय ही क्लेष का मूल है , इसकी वेदना दृष्ट अर्थात वर्तमान या अदृष्ट अर्थात अगले जन्मों में व्यक्त होगी ।

इस मूल से जाति , आयु एवं भोग का विपाक होता है ।

इन पुण्य एवं अपुण्य कारणों से आह्लाद एवं परिताप होता है ।

परिणाम ताप, संस्कार से दुख एवं गुण तथा वृत्ति के विरोध से दुख – विवेकी सर्वत्र दुख देखता है ।

अनागत दुख हेय है ।

द्रष्टा एवं दृष्य के संयोग से यह हेय है ।

दृश्य प्रकाश , क्रिया एवं स्थिति के चरित्र , भूत एवं इन्द्रियों, और भोग एवं अपवर्ग के अर्थ से बनता है ।

विशेष , अविशेष , लिंगमात्र , एवं अलिंग – ये गुण के पर्व हैं ।

द्र्ष्टा शुद्ध दृशिमात्र है , परंतु प्रत्यय के अनुरुप दिखता है ।

उस दृष्य का रुप उस द्र्ष्टा के लिये है ।

अपना अर्थ पूरा कर दृष्य नष्ट हो जाता है , परंतु अन्य साधारण दृष्टि अनष्ट रहते हैं ।

स्वरुप की उपलब्धि का कारण स्व एवं स्वामी की शक्ति का संयोग है ।

यह अविद्या के कारण है ।

उसके अभाव से संयोग का भाव समाप्त हो जाता है । वही कैवल्य का देखना है ।

अविप्लव विवेकख्याति इसको समाप्त करने के उपाय हैं ।

प्रज्ञा की भूमि इन सात प्रकार के प्रांतों में है ।

योग के अंगों के अनुष्ठान से उपजी ज्ञान की दीप्ति विवेक और दीखता है ।

यम , नियम , आसन , प्राणायम , प्रत्याहर , धारणा , ध्यान एवं समाधि – ये आठ अंग है ।

अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह – ये यम हैं ।

जाति , देश , काल एवं समय से परे ये सार्वभौम महाव्रत है ।

शौच , संतोष , तप , स्वाध्याय एवं ईश्वरप्रणिधान – ये नियम हैं ।

वितर्क भावों को प्रतिपक्ष भावों से रोका जा सकता है ।

हिंसा आदि वितर्क भाव , जो स्वयं , दूसरों से अथवा अनुमोदित करने से मृदु , मध्य अथवा अधिमात्रा में उत्पन्न होता है , दुख एवं अज्ञान रुपी अनंत फल देता है – यही प्रतिपक्ष भाव है ।

अहिंसा में प्रतिष्ठित होने पर , उनके सान्निध्य में वैर का त्याग हो जाता है ।

सत्य में प्रतिष्ठित होने पर क्रिया के फल का आश्रय हो जाता है ।

अस्तेय में प्रतिष्ठित होने पर सभी रत्न स्वयं उपस्थित हो जाते हैं ।

ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित होने पर वीर्य का लाभ होता है ।

अपरिग्रह की स्थिति हो जाने पर जन्म के कारण का संबोध हो जाता है ।

शौच से अपने अंग से वैराग्य एवं दूसरों से संसर्ग न करने की भावना होती है ।

इसके अलावा , सत्त्व , शुद्धि , सौमनस्य , एकाग्रता , इन्द्रियों पर विजय एवं आत्मदर्शन की योग्यता भी आती है ।

संतोष से अत्युत्तम सुख का लाभ होता है ।

तप से अशुद्धि कम होता है , जिससे देह और इन्द्रियों की सिद्धि हो जाती है ।

स्वाध्याय से इष्ट देवता की प्राप्ति हो जाती है ।

ईश्वर प्रणिधान से समाधि की सिद्धि हो जाती है ।

सुखपूर्वक स्थिर होना आसन है |

इसमें प्रयत्न में शिथिलता से अनंत की समापत्ति हो जाती है ।

तब द्वन्द्वों से आघात नहीं होता ।

इसमें स्थिर हो जाने के बाद श्वास एवं प्रश्वास में रुकना प्राणायाम है ।

यह वाह्य , अभ्यंतर और स्तंभवृत्ति , स्थान , समय एवं संख्या , दीर्घ एवं सूक्ष्म की दृष्टि का होता है ।

वाह्य एवं अंदर के विषयों का त्याग करने वाला चतुर्थ प्रकार है ।

तब प्रकाश के उपर का आवरण क्षीण हो जाता है ।

और धारणा में मन की योग्यता हो जाती है ।

अपने विषयों के असम्प्रयोग से चित्त के स्वरुप के अनुरुप इन्द्रियों का हो जाना प्रत्याहार है ।

उससे इन्द्रियों की परम वश्यता हो जाती है ।

वाह्य एवं अंदर के विषयों का त्याग करने वाला चतुर्थ प्रकार है ।

तब प्रकाश के उपर का आवरण क्षीण हो जाता है ।

और धारणा में मन की योग्यता हो जाती है ।

अपने विषयों के असम्प्रयोग से चित्त के स्वरुप के अनुरुप इन्द्रियों का हो जाना प्रत्याहार है ।

उससे इन्द्रियों की परम वश्यता हो जाती है ।

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