सांख्य दर्शन के मुख्य ग्रन्थ

सांख्य दर्शन के मुख्य ग्रन्थ – सांख्य के बहुत से प्राचीन ग्रन्थ ई समय लिप्त हैं | कई एक के केवल नाम ही मिलते है |

१. कपिल मुनि प्रणीत ‘तत्त्वसमास’ – इसके वर्तमान समय में केवल २२ सूत्र मिलते हैं | वास्तव में इसी को सांख्य दर्शन कहना चाहिए | इसका उपदेश भगवान कपिल ने आसुरि जिज्ञासु को किया था |

२. पंचशिखाचार्य के सूत्र – आसुरि ने कपिल मुनि से प्राप्त की हुई सांख्य के शिक्षा का पंचशिखाचार्य को उपदेश दिया | इन सूत्रों का ग्रन्थ लुप्त हैं | महर्षि व्यास ने अपने योगदर्शन के भाष्य में इसके लगभग २१ सूत्रों को कई स्थानों में उद्धृत किया हैं |

३. वार्षगण्याचार्यप्रणीत षष्टितंत्र – यह ग्रन्थ भी नहीं मिलता हैं |ईश्वरकृष्ण आर्य ने षष्टितंत्र के आधार पर ही अपनी सांख्यसप्तति को बनाया हैं | व्यास जो ने भी योगदर्शन की भाष्य में वार्षगण्याचार्य के वचनों को कई स्थानों पर लिखा हैं |

४. सांख्यसप्तति – श्री कृष्ण ने षष्टितंत्र के सविस्तार विषय को ही सांख्यसप्तति में संक्षिप्त किया हैं | इसमें ७० कारिकाएँ हैं इसलिए सप्तति कहलाती हैं |

५. सांख्य सूत्र – ५२७ सूत्र ६ अध्यायों में वजभक्त हैं | सामान्यतया ये कपिल मुनि के बनाये सूत्र माने जाते हैं | इनके सम्बन्ध में आधुनिक विद्वानों का विचार हैं कि यह सांख्यसप्तति के आधार पर लिखा हुआ ग्रन्थ हैं |

६. श्वेताश्वर – उपनिषद और गीता – भी सांख्य और योग के ग्रन्थ हैं | श्वेताश्वर में उसके आभ्यन्तर रूप और गीता में आभ्यन्तर और सिद्धांतों के अतिरिक्त कार्यक्षेत्र में व्यवहारिक रूप को विशेषता के साथ दर्शाया गया हैं |गीता में सांख्य और योग इन दो निष्ठाओं का विशेष रूप से वर्णन हैं | सांख्य कि निष्ठा तीनों गुणों के सर्वथा परित्यागपूर्वक होती हैं | यथा कर्योग में योगनिष्ठा में सारे कर्मों और उनके फलों को ईश्वर के समर्पण करके फलों कि वासनाओं से मुक्त कराया जाता हैं |

७. श्रीमद्भागवत – के तीसरे स्कंध में जो कपिल भगवान ने अपनी माता को उपदेश दिया हैं , वह भी सांख्य कि उच्च कोटि का हैं |गीता में सांख्य और योग इन दो निष्ठाओं का विशेष रूप से वर्णन हैं | सांख्य कि निष्ठा तीनों गुणों के सर्वथा परित्यागपूर्वक होती हैं | यथा कर्योग में योगनिष्ठा में सारे कर्मों और उनके फलों को ईश्वर के समर्पण करके फलों कि वासनाओं से मुक्त कराया जाता हैं |

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