सांख्य और योग दर्शन

सांख्य और योग दर्शन – परमात्मा ( चेतनतत्त्व) के निर्गुण शुद्ध स्वरुप का वर्णन उपनिषदों में विस्तारपूर्वक किया गया है, इसलिए उपनिषदों को वेदांत कहते है – ज्ञान का अन्त अर्थात जिसके जानने के बाद कुछ जानना शेष न रहे | योग और सांख्य में उसके जानने के साधन विशेष रूप से बतलाये गए हैं |

सांख्य के समान दूसरा कोई ज्ञान नहीं है और योग के समान कोई दूसरा बल नहीं है |

चित्त का नाश करने के लिए केवल दो निष्ठाएँ बतलायी गयी हैं- योग और सांख्य | योग चित्तवृत्ति निरोध से प्राप्त किया जाता हैं और सांख्य सम्यक ज्ञान से |

सांख्य के प्रवर्तक श्री कपिलमुनि हुए हैं और योग दर्शन के निर्माता श्री पतञ्जलिमुनि | कपिल मुनि आदिविद्वान और प्रतम् दर्शनकार हैं | यद्यपि ये दोनों फिलासफी अलग अलग नाम से वर्णित की गयी हैं किन्तु वास्तव में दोनों एक ही हैं |

सांख्य और योग दोनों आरम्भ में एक ही स्थान से चलते हैं और अन्त में एकहि स्थान पर मिल जाते हैं , किन्तु योग बीच में थोड़े से घुमाववाली पक्की सड़क से चलता हैं और सांख्य सीधा कठिन रास्ते से जाता है |

सांख्य और योग में बहिर्मुख होकर संसारचक्र में घूमने के कारण – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, क्लेश तथा सकाम कर्म बतलाये गए हैं |

इसी क्रमानुकर अन्तर्मुख होने के साधन अष्टांग योग ( यम, नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि है |

योग द्वारा अन्तर्मुख होना – यम, नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार ये पांच बहिरंग साधन हैं और धारणा, ध्यान, समाधि अंतरंग साधन हैं | ये तीनों अंतरंग साधन भी , असम्प्रज्ञात समाधि ( स्वरूपास्थिति ) के बहिरंग साधन हैं, उसका अंतरंग साधन नेति-नेतिरूप पर – वैराग्य हैं , जिसके द्वारा चित्त से अलग आत्मा को साक्षात्कार करने वाली ‘विवेक ख्याति रूप’ सात्विक वृत्ति का भी निरोध हो कर ( शुद्ध चैतन्य ) स्वरूपास्थिति का लाभ होता हैं |

सांख्य द्वारा अन्तर्नुख होना – अष्टांग योग हे पहले पांच बहिरंग साधन सांख्य और योग में सामन हैं , जहाँ योग में सालम्बन अर्थात धारणा, ध्यान, समाधि द्वारा किसी विषय को ध्येय बना कर अन्तर्मुख होते हैं , वहाँ सांख्य में निरालम्ब अर्थात बिना किसी विषय को ध्येय बना कर अन्तर्मुख होते हैं | उसमे धारणा, ध्यान, समाधि के स्थान में – ” चित्त और उसकी वृत्तियाँ दोनों ही त्रिगुणात्मक हैं इसलिए गुण ही गुणों में बरत रही हैं ” – इस भावना से आत्मा को – “चित्त से पृथक अकर्त्ता” केवल शुद्ध स्वरुप में देखना होता है |

” यह आत्मा साक्षात्कार कराने वाली विवेक ख्यातिरूप एक गुणों की ही सात्त्विक वृत्ति है ” इस प्रकार इस वृत्ति का भी निरोध , पर- वैराग्य द्वारा होने पर ( शुद्ध चैतन्य ) स्वरूपास्थिति को प्राप्त होते हैं |

अर्थात जो वृत्ति आये उसको हटाना हटाना है | अन्त में सब वृत्तियाँ रुक जाने पर निरोध करने वाली वृत्ति का भी निरोध करके स्वरूपास्थिति को प्राप्त होना हैं |

सांख्य और योग का व्यवहार

साधारण अयोगी लोगों के कर्म पपप, पुण्य और पाप-पुण्य से मिश्रित तीन प्रकार के होते हैं |

योगियों का कर्म न पापमय होता हैं न पुण्यमय क्योंकि योगी के लिए पापकर्म सर्वथा त्याज्य ही हैं और कर्तव्यरूप पुण्य कर्म वह आसक्ति, लगाव, ममता, और अहंता को छोड़कर कर्म और उसके फल को ईश्वर के समर्पण करके निष्काम भाव से करता हैं इसलिए बंधन रूप न होने से अकर्मरूप ही हैं |

संख्या योगी गुण गुणों में ही बरत रहे हैं , आत्मा अकर्ता हैं , इस प्रकार इसके लगाव से मुक्त रहते हैं | आत्मा इनका द्रष्टा , इनसे पृथक निर्लेप है |

गीता में सांख्य को ज्ञान योग तथा संन्यास योग के नाम से भी वर्णन किया गया है |

सांख्य नाम रखने का यह कारण भी हो सकता है किइसमें गिने हुए पच्चीस तत्त्व माने गए है |
सांख्य नामकरण का रहस्य इसके एक विशिष्ट सिद्धांत में भी छिपा हुआ है जिसका दूसरा नाम “सम्यक विवेक ज्ञान” है | किसी वास्तु के विषय में तद्गत दोषों तथा गुणों की छानबीन करना भी ‘संख्या’ कहलाता है |

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