समाधिपाद

समाधिपाद (पातञ्जलयोगप्रदीप – योगदर्शन)

अब योगानुशासन का प्रारम्भ करते हैं ॥ १ ॥

योग चित्त की वृत्ति का निरोध है ॥ २ ॥

उस समय द्रष्टा अपने रुप में स्थिर हो जाता है ॥ ३ ॥

दूसरे समय में वृत्ति के सदृश स्वरुप होता है ॥ ४ ॥

क्लिष्ट एवम अक्लिष्ट वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं ॥ ५ ॥

पाँच वृत्तियाँ हैं – प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा एवम स्मृति ॥ ६ ॥

प्रत्य़क्ष , अनुमान एवं आगम – ये प्रमाण हैं ॥ ७ ॥

दूसरे रुप में प्रतिष्ठित होने का मिथ्या ज्ञान विपर्यय है ॥ ८ ॥

विकल्प शब्दज्ञान से होता है , वस्तु से नहीं ॥ ९ ॥

निद्रा वृत्ति प्रत्यय अर्थात अनुभव के अभाव पर आधारित है ॥ १० ॥

अनुभव किये हुए विषयों का न छुपना अर्थात प्रकट हो जाना स्मृति है ॥ ११ ॥

वृत्तियों का निरोध अभ्यास एवं वैराग्य से होता है ॥ १२ ॥

वह अर्थात वृत्तियाँ यत्न पूर्वक अभ्यास से स्थित हो जाती हैं ॥ १३ ॥

और , वह, अर्थात अभ्यास , लम्बे समय तक लगातार आदरपूर्वक करने पर दृढ होते जाता है ॥ १४ ॥

देखे और सुने हुए विषयों के प्रति तृष्णा , अर्थात लगाव , के अभाव के वशीभूत हो जाना वैराग्य है ॥ १५ ॥

तब परम पुरूष दिखता है , और गुणों से वितृष्णा आ जाती है ।

सम्प्रज्ञात में वितर्क , विचार , आनन्द एवं अस्मिता का अनुगमन होता है ।

पहले प्रत्यय में विराम आता है , और सिर्फ संस्कार शेष रहते हैं ।

विदेह में , अर्थात देह न रहने , पर भवप्रत्यय प्रकृति में लीन हो जाते हैं ।

दूसरे योगी श्रद्धा , वीर्य , स्मृति , समाधि एवं प्रज्ञा से होते है ।

तीव्र संवेग से शीघ्र होता है ।

उनमें भी मृदु , मध्य एवं उच्च का भेद हो जाता है ।

अथवा , ईश्वर प्रणिधान से भी होता है ।

क्लेश , कर्म , विपाक और आशय से जो विशेष पुरूष अपरामृष्ट हो वह ईश्वर है ।

वह सब ज्ञान का बीज है और उससे कोई अतिशय नहीं है ।

काल से भी अनवच्छेदित , वह पूर्वजों का भी गुरू है ।

प्रणव अर्थात ॐ उसका वाचक है ।

उसके अर्थ के भाव के साथ उसका जप करो ।

उससे अंतरात्मा की चेतना का ज्ञान एवं विघ्नों का अभाव अर्थात अंत हो जाता है ।

व्याधि , स्त्यान , संशय , प्रमाद , आलस्य , अविरति , भ्रांतिदर्शन , अलब्धभूमिकत्व एवं अनवस्थित्व – ये चित्त के विक्षेप ही अंतराय अर्थात विघ्न हैं ।

दुख, दौर्मनस्य, अंगमेजयत्व, श्वास एवं प्रश्वास – ये चित्तविक्षेप से अनुभूत होते हैं ।
विक्षेपों से इन भावों का अनुभव होता है ।

उनके प्रतिषेध के लिये एकतत्व का अभ्यास करना चाहिये ।

सुख-दुख पुण्य-अपुण्य विषयों में मैत्री , करुणा , मुदिता एवं उपेक्षा की भावनाओं से चित्त शांत हो जाता है ।

अथवा प्राण को बाहर रोकने से भी ऐसा होता है ।

अथवा विषयों से उत्पन्न होने वाली प्रवृत्तियों को स्थिर मन बाँध देती है ।

शोकरहित एवं ज्योतिपूर्ण भावों से भी होता है ।

अथवा चित्त को राग एवं विषय से स्वतंत्र करने पर होता है ।

स्वप्न एवं निद्रा के ज्ञान पर आधारित चित्त भी स्थिर होता है ।

जिसका जैसा अभिमत हो , उसके ध्यान से भी ( चित्त स्थिर हो जाता है ) |

उसका परमाणु से लेकर परम महत्व तक वश में हो जाता है ।

वृत्तियो के क्षीण हो जाने पर समापत्ति उत्पन्न होती है , जिसमें ग्रहीतृ , ग्रहण एवं ग्राह्येषु में स्थिर वैसा ही स्वरुप ले लेता है , जैसा पवित्र मणि लेता है ।

तब शब्द , अर्थ एवं ज्ञान के विकल्प से संकीर्ण समापत्ति सवितर्क है ।

निर्वितर्क समापत्ति में स्मृति के परिशुद्ध हो जाने पर स्वरुप शून्य हो जाता है , केवल अर्थ का ही भास होता है ।

इसी प्रकार से सूक्ष्म विषयों की व्याख्या सविचार एवं निर्विचार में है ।

तथा सूक्ष्म विषय अलिंग एवं पर्यवसानम है ।

ये सभी सबीज समाधि है ।

निर्विचार की पवित्रता में अध्यात्म प्रसन्न होता है ।

तब प्रज्ञा ऋतंभरा हो जाती है ।

इसमें विषयों का अर्थ श्रुत (सुने हुए ) , अनुमानित ( अनुमान किये हुए ) एवं प्रज्ञा से प्राप्त अनुभओं से अलग एवं विशेष होता है |

तब उत्प्न्न संस्कार अन्य संस्कारों को समाप्त कर देते हैं ।

जब वह संस्कार भी समाप्त हो जाता है , सब संस्कार समाप्त हो जाते हैं , वह निर्बीज समाधि है ।

 

Leave a Reply