वैशेषिक दर्शन

वैशेषिक दर्शन – इस दर्शन का नाम कणाद और औलूक्य भी है | वैशेषिक का अर्थ है पदार्थों में भेदों का बोधक , और पदार्थ उसे कहते हैं जो प्रतीति से सिद्ध हो | विशेष नामक पदार्थ की विशिष्ट कल्पना करने के कारण इसको वैशेषिक संज्ञा प्राप्त हुई है |

वैशेषिक सूत्रों की संख्या ३७० है जो दस अध्यायों में विभक्त है |

१. प्रथम अध्याय के प्रथम आह्लिक में द्रव्य, गुण तथा कर्म के लक्षण तथा विभाग का तथा ‘सामान्य’ का ;

२./३. दूसरे तथा तीसरे में नौ द्रव्यों का ;

४. चौथे में परमाणुवाद का तथा अनिय्या द्रव्य विभाग का ;

५. पाँचवे में कर्म का ;

६. छटे में वेद – प्रामाण्य के विचार के बाद धर्म- अधर्म का ;

७./८. सातवे तथा आठवें में कतिपय गुणों का ;

९. नवें में अभाव तथा ज्ञान का और

१०. दसवें में सुख – दुःख – विभेद तथा विविध कारणों का वर्णन किया गया है |

(१) द्रव्य – नौ है |

१. पृथिवी,
२. जल,
३. अग्नि,
४. वायु,
५. आकाश,
६. काल,
७. दिशा,
८. आत्मा और
९. मन |

(२) गुण – चौबीस है |

१. रूप,
२. रस,
३. गंध,
४. स्पर्श,
५. संख्या,
६. परिणाम,
७. पृथकत्व,
८. संयोग,
९. विभाग,
१०,११, परत्व , अपरत्व ,
१२. गुरुत्व,
१३. द्रवत्व,
१४. स्नेह,
१५. शब्द,
१६. बुद्धि,
१७. सुख,
१८. दुःख,
१९. इच्छा,
२०. द्वेष,
२१. प्रयत्न,
२२,२३. धर्म, अधर्म,
२४. संस्कार |

(३) कर्म – यह पांच प्रकार का है –

१. उत्पेक्षण – ऊपर फेंकना,
२. अवक्षेपण – नीचे गिराना,
३. आकुंचन – सिकोड़ना,
४. प्रसारण – फैलाना और
५. गमन – अन्य सब प्रकार की क्रिया |

(४) सामान्य – किसी अर्थ की जो जाती है वह सामान्य है, जैसे वृक्ष की वृक्षत्व और मनुष्य की मनुष्यत्व जाती है | जाती बहुतों में एक होती है, जैसे सारे वृक्षों में वृक्षात्व जाती एक है | जो एक ही हो उसमे जाती नहीं रहती जैसे दिशा , काल, आकाश और आत्मा में |

सामान्य के दो भेद हैं- पर सामान्य और अपर सामान्य | जैसे वृक्षत्व पर सामान्य कहलाती हैं; उसकी अवान्तर जाती जैसे आम्रत्व अपर सामान्य कहलाती हैं | अपर सामान्य को सामन्य विशेष भी कहते हैं |

पर सामान्य  अपर सामान्य सापेक्ष है | वृक्षत्व की अपेक्षा आम्रत्व अपर सामान्य है किन्तु वृक्षत्व भी पृथ्वीत्व की अपेक्षा अपर सामान्य है और आम्रत्व भी अपनी अवांतर जातियों की अपेक्षा से पर सामान्य है |

जिसकी आगे कोई अवांतर जाती न हो वह केवल अपर सामान्य होता है जैसे घटत्वादि और जिसकी व्यापक जाती न हो वह केवल पर सामान्य ही होता है |

ऐसी जाती केवल सत्ता है | सत्ता वह है जिससे सत-सत इस प्रकार की प्रतीति होती है | सत्ता सारे द्रव्यों, सारे गुणों और सारे कर्मों में होती है अर्थात द्रव्य सत है , गन सत है और सारे कर्म सत है |

द्रव्य सत यानी पर सामान्य है और सारी द्रव्यत्वादि जातियाँ अपर सामान्य है, किन्तु इन द्रव्यत्वादि जातियों में से हर एक जाती अनेक व्यक्तियों में रहती है, इसलिए प्रधानतय वे सामान्य ही हैं, किन्तु अपने आश्रय ( द्रव्यादि ) को दूसरे पदार्थों से अलग भी करती हैं इसलिए गौणतया विशेष शब्द से कही जाती हैं , किन्तु जो विशेष पदार्थ हैं वह इनसे अलग ही हैं |

(५) विशेष – जैसे घोड़े से गौ में विलक्षण प्रतीति जाती – निमित्तक होती हैं और एक गौ से दूसरी गौ में विलक्षण प्रतीति का निमित्त – रूप या अवयवों की बनावट आदि का भेद हैं |

इसी प्रकार एक ही जाती, गुण और कर्म वाले परमाणुओं में जो एक दूसरे से विलक्षण प्रतीति होती हैं उसका कोई निमित्त होना चाहिए , परमाणुओं में बनावट आदि का और कोई भेद असंभव होने से, जो वहाँ भेदक धर्म हैं वही ‘विशेष’ पदार्थ हैं | यह विलक्षण प्रतीति योगियों में होती हैं |

वह विशेष सारे नित्य द्रव्यों में रहता हैं, क्योंकि अनित्य द्रव्यों में और गुण – कर्मादि में तो आश्रय के भेद से भेद कहा जा सकता हैं , किन्तु नित्य द्रव्यों में नहीं | इस लिए हर एक नित्य द्रव्य में एक – एक विशेष होता हैं जिससे वे विलक्षण प्रतीत होते हैं |

देश- काल के भेद में भी यह वही परमाणु है , यह पहचान जो योगियों की होती है इसका निमित्त भी विशेष पदार्थ है |

अर्थात पहचान और विलक्षण प्रतीति किसी निमित्त से होती है और वह निमित्त परमाणुओं में वह विशेष पदार्थ है जो उससे अलग है | इस विशेष पदार्थ का पता इसी दर्शन ने लगाया है इसीलिए इसे वैशेषिक कहते है |

(६) समवाय – सम्बन्ध सदा दो में होता है , जैसे कुंडे और दही का संबंध है | इनमे दोनों एल दूसरे से अलग है | ऐसे संबंध को संयोग कहते है | किनती जो ऐसा घना सम्बन्ध है की सम्बन्धी न अलग अलग थे और न हो सकते है वहाँ सम्बन्ध को समवाय कहते है, जैसे गुण – गुणी का सम्बन्ध | इसी प्रकार क्रियावालों में क्रिया , व्यक्ति में जाती और नित्य द्रव्यों में अपर – सामान्य , समवाय सम्बन्ध से रहते हैं|

आभाव पदार्थ – वैशेषिक आचार्यों ने छः भाव पदार्थों के अतिरिक्त ‘अभाव’ भी एक अलग पदार्ह निरूपण किया हैं | अभाव चार प्रकार का हैं –

१. किसी वास्तु की उत्पत्ति से पहले उसका अभाव प्रागभाव ,
२. नाश के पीछे उसका अभाव प्रन्ध्यवसाभाव ,
३. किसी वास्तु का नितांत अभाव अत्यन्ताभाव और
४. एक वस्तु में दूसरी वस्तु का अभाव अन्योन्याभाव हैं |

वैशेषिक दर्शन कणाद मुनि द्वारा एवं न्याय  दर्शन गौतम मुनि द्वारा रचित है | कणाद तथा उनके पिता उलूक ऋषि के नाम पर वैशेषिक दर्शन को कणाद और औलूक्य कहते हैं |

न्याय दर्शन एक प्रकार से वैशेषिक सिद्धांत की ही विस्तृत व्याख्या हैं या यों कहिये कि दोनों दर्शन में एक ही फिलासफी हैं जिसका पूर्वाङ्ग वैशेषिक हैं और उत्तराङ्ग न्याय |
वैशेषिक दर्शन में हेय, हेय-हेतु, हान और हानोपाय को समझने के लिए छः पदार्थ १. द्रव्य, २. गुण, ३. कर्म, ४. सामान्य, ५. विशेष, और ६. समवाय का निरूपण किया है |

इन्ही के सामान्य धर्म और विशेष धर्म के तत्त्वज्ञान से मोक्ष बतलाया गया है |

 

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