विभूतिपाद

विभूतिपाद (पातञ्जलयोगप्रदीप – योगदर्शन)

चित्त का वृत्ति मात्र से किसी स्थान विशेष में बाँधना ‘धारणा’ कहलाता है ||१||

उसमें वृत्ति का एक-सा बना रहना ‘ध्यान’ है ||२||

वह ध्यान ही ‘समाधि’ कहलाता है, जब उसमें ध्येय अर्थमात्र से भासता है और उसका (ध्यानका) स्वरुप शुन्य जैसा हो जाता है ||३||

तीनों (धारणा, ध्यान और समाधि) का एक विषय में होना ‘संयम’ कहलाता है ||4||

उस ( संयम) के जय से समाधि प्रज्ञा का प्रकाश होता है ||५||

उस संयम का (चित्त) भूमियों में विनियोग करना चाहिए ||६||

पहलों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार ) की अपेक्षा से तीनों (धारणा, ध्यान और समाधि ) अन्तरंग हैं ||७||

वह ( धारणा, ध्यान, समाधि ) भी असम्प्रज्ञात समाधि का बाहर का अंग है ||८||

व्युत्थान ( क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त ) के संस्कार का दबना और निरोध ( असम्प्रज्ञात समाधि ) के संस्कार का प्रकट होना , यह जो निरोधकाल में होनेवाले चित्त का दोनों संस्कारों में अनुगत होना है, यह निरोध परिणाम कहा जाता है ||९||

निरोध-संस्कार से चित्त की शांत – प्रवाहवाली गति होती है ||१०||

चित्त के सर्वार्थता और एकाग्रता रूप धर्मों का ( क्रम से) नाश होना और प्रकट होना चित्त का समाधि – अवस्था में परिणाम है ||११||

तब फिर सामान वृत्तियों का शांत और उदय होना चित्त का एकाग्रता – परिणाम है ||१२||

चित्त के परिणाम से ही भूतों और इन्द्रियों में धर्म, लक्षण और अवस्था – परिणाम व्याख्या किये गए जानने चाहिए ||१३||

( उन परिणामों के) अतीत , वर्तमान और भविष्यत् धर्मों में अनुगत धर्मी ||१४||

क्रमों का भेद परिणाम के भेद में हेतु है ||१५||

तीनों परिणामों में संयम करने से भूत और भविष्यत् का ज्ञान होता है ||१७||

शब्द, अर्थ और ज्ञान के परस्पर के अध्यास से अभेद भासना होता है | उनके विभाग में संयम करने से सब प्राणियों  के शब्द का ज्ञान होता है ||१७||

संस्कार के साक्षात करने से पूर्व जन्म का ज्ञान होता है ||१८||

दूसरे के चित्त की वृत्ति के साक्षात करने से दूसरे के चित्त का ज्ञान होता है ||१९||

पर वह ( दूसरे का चित्त ) अपने विषय सहित साक्षात नहीं होता ; क्योंकि वह ( विषयसहित चित्त) उसका ( संयम का ) विषय नहीं है ||२१||

कर्म सोपक्रम और निरोपक्रम दो प्रकार के होते हैं | उनमें संयम करने से मृत्यु का ज्ञान होता हैं अथवा अरिष्टों से मृत्यु का ज्ञान होता हैं ||२२||

मैत्री आदि में संयम करने से मैत्री आदि बल प्राप्त होता है ||२३||

हाथी आदि के बलों में संयम करने से हाथी आदि के बल प्राप्त होते हैं ||२४||

प्रवृत्ति में प्रकाश डालने से सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट वस्तु का ज्ञान होता है ||२५||

सूर्य में संयम करने से भुवन का ज्ञान होता है ||२६||

चन्द्रमा में संयम करने से ताराओं के व्यूह का ज्ञान होता है ||२७||

ध्रुव में संयम करने से ताराओं की गति का ज्ञान होता है ||२८||

नाभि – चक्र में संयम करने से शरीर के व्यूह का ज्ञान होता है ||२९||

कंठ – कूप में अन्यम करने से क्षुधा और पिपासा की निवृत्ति होती है ||३०||

कूर्म- नाड़ी में संयम करने से स्थिरता होती है ||३१||

मूर्धा की ज्योति में संयम करने से सिद्धों का दर्शन होता है ||३२||

अथवा प्रातिभ-ज्ञान से योगी सब कुछ जान लेता है ||३३||

ह्रदय में संयम करने से चित्त का ज्ञान होता है ||३४||

चित्त और पुरुष जो परस्पर अत्यंत भिन्न हैं, इन दोनों की प्रतीतियों का अभेद भोग है | उनमें से परार्थ – प्रतीति से भिन्न जो स्वार्थ – प्रतीति है उसमें संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता है ||३५||

उस स्वार्थ- संयम के अभ्यास से प्रातिभ, श्रावण , वेदना, आदर्श, आस्वाद और वार्ता – ज्ञान उत्पन्न होता है ||३६||

वे उपर्युक्त छः सिद्धियाँ समाधि ( पुरुष- दर्शन) में विघ्न हैं , व्युत्थान में सिद्धियां है ||३७||

बंध के कारण के शिथिल करने से और घूमने के मार्ग के जानने से चित्त ( सूक्ष्म – शरीर ) का दूसरे में आवेश होता है ||३८||

(संयम द्वारा) उड़ान के जीतने से जल, कीचड़, काँटों आदि में असंग रहना और उर्ध्व गति होती है ||३९||

(संयम द्वारा) समान के जीतने से योगी का दीप्तीमान होना होता है ||४०||

श्रोत्र और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से दिव्य श्रोत्र होता है ||४१||

शरीर और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से और हलके रुई आदि में समापत्ति करने से आकाश- गमन सिद्धि प्राप्त होती है ||४२||

शरीर के बाहर कल्पना न की हुई वृत्ति महाविदेहा है , उससे प्रकाश के आवरण का नाश होता है ||४३||

पांचों भूतों के स्थूल , स्वरुप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थतत्त्व में संयम करने से भूतों का जय होता है ||४४||

उस भूतजय से अणिमा आदि आठ सिद्धियों का प्रादुर्भाव और कायसम्पत होती है और उन पाँचों भूतों के धर्मों से रुकावट नहीं होती ||४५||

रूप , लावण्य, बल, वज्र की – सी बनावट | कायसम्पत ( शरीर की सम्पदा) कहलाती है ||४६||

ग्रहण, स्वरुप, अस्मिता, अन्वय और अर्थतत्त्व में संयम करने से इन्द्रियजय होता है ||४७||

इन्द्रियजय से मनोजवित्व , विकिरणभाव और प्रधान का जय होता है ||४८||

चित्त और पुरुष के भेद जानने से सारे भावोंका मालिक होना और सर्वज्ञ होना प्राप्त होता है ||४९||

विवेक – ख्याति से भी वैराग्य होने पर दोषों के बीज -क्षय होने पर कैवल्य होता है ||५०||

स्थान वालों के आदर – भाव करने पर लगाव एवं घमंड नहीं करना चाहिए ; क्योंकि ( इसमें ) फिर अनिष्ट के प्रसंग का भय है ||५१||

क्षण और इसके क्रमों में संयम करने से विवेकज – ज्ञान उत्पन्न होता है ||५२||

एक – दूसरे से जाती , लक्षण, देश से भेद का निश्चय न होने से दो तुल्य वस्तुओं का विवेकज-ज्ञान से निश्चय होता है ||५३||

बिना निमित्त के अपनी प्रभा से स्वयं उत्पन्न होने वाला, सबको विषय करने वाला, सब प्रकार से विषय करने वाला , बिना क्रम के एक साथ ज्ञान को विवेकज – ज्ञान कहते हैं ||५४||

चित्त और पुरुष के समान शुद्धि होने पर कैवल्य होता है ||५५||

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