योग दर्शन

योग दर्शन

योग दर्शन के आदि आचार्य हिरण्यगर्भ है | हिरण्यगर्भ – सूत्रों के आधार पर ( जो इस समय लुप्त है ) पतञ्जलि मुनि ने योग दर्शन का निर्माण किया |

योगदर्शन के चार पाद है और १९५ सूत्र है | समाधिपाद में ५१, साधनपाद में ५५, विभूतिपाद में ५५ और केवल्यपाद में ३४ |

१. समाधिपाद – इसमें समाहितचित्त वाले सबसे उत्तम अधिकारियों के लिए योग का वर्णन किया गया है |

सारा समाधिपाद एक प्रकार से निम्न तीन सूत्रों की विस्तृत व्याख्या है |

(१) योग चित्त की वृत्तियों का रोकना है |

(२) वृत्तियों का निरोध होने पर द्रष्टा के स्वरुप में अवस्थिति होती है |

(३) स्वरूपावस्थिति से अतिरिक्त अवस्था में द्रष्टा वृत्ति के समान रूप वाला प्रतीत होता है |

चित्त , बुद्धि, मन, अन्तःकरण लगभग पर्यायवाचक समानार्थक शब्द है . जिनका भिन्न – भिन्न दर्शनकारों ने अपनी अपनी परिभाषा में प्रयोग किया है |

मन की चञ्चलता प्रसिद्ध है | सृष्टि के सारे कार्यों में मन की स्थिरता ही सफलता का कारण होती है | सृष्टि के महान पुरुषों की अद्भुत शक्तियों में उनके मन की एकाग्रता का रहस्य छिपा हुआ होता है |

योग के अन्तर्गत मन को दो प्रकार से रोकना होता है – एक तो केवल एक विषय में लगातार इस प्रकार लगाए रखना किदूसरा विचार न आने पावे , इसको एकाग्रता अथवा सम्प्रज्ञात समाधि कहते है जिसके चार भेद है |

(१) वितर्क – किसी स्थूल विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता |

(२) विचार – किसी सुक्ष्म विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता |

(३) आनन्द – अहंकार विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता |

(४) अस्मिता – अहंकार रहित अस्मिता विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता |

इसकी सबसे ऊँची अवस्था विवेक ख्याति है , जिसमे चित्त का आत्माध्यास छूट जाता है और उसके द्वारा आत्मस्वरूप का उससे पृथक – रूप में साक्षात्कार होता है , किन्तु योग दर्शा में इसको वास्तविक आत्मा स्थिति नहीं बतलाया गया है | यह भी चित्त की एक वृत्ति अथवा मन का ही एक विषय है ( एक उच्चत्तम सात्त्विक वृत्ति ) , किन्तु इसका निरन्तर अभ्यास वास्तविक स्वरूपस्थिति में सहायक होता है |
निरोध अपने स्वरुप का सर्वथा नाश हो जाना नहीं है , किन्तु जड़ तत्त्व के अविकेकपूर्ण संयोग का चेतन तत्त्व से सर्वथा नाश हो जाना है | इस संयोग के न रहने पर द्रष्टा की सुद्ध परमात्मा स्वरुप में अवस्थिति होती है |

२. साधनपाद – इसमें विक्षिप्त चित्तवाले मध्यम अधिकारियों के लिए योग का साधन बतलाया गया है |

सर्वबन्धनों और दुःखों के मूल कारण पांच क्लेश है – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश |

क्लेशों से कर्म की वासनाएँ उत्पन्न होती है |

कर्म – वासनाओं से जन्म रूप वृक्ष उत्पन्न होता है |

उस वृक्ष में जाती, आयु और भोग रुपी तीन प्रकार के फल लगते है |

इन तीन फलों से सुख – दुःख रुपी दो प्रकार का स्वाद होता है |

जो पुण्य कर्म ( हिंसा रहित कूसरे के कल्याणार्थ ) किये जाते है उनसे जाती , आयु और भोग में सुख मिलता है |

जो पाप कर्म ( हिंसात्मक दूसरों को दुःख पहुंचाने की लिए) किये जाते हैं उनसे जाती, आई और भोग में दुःख पहुँचता है |

किन्तु यह सुख भी तत्त्ववेत्ता की दृष्टि में दुःखस्वरूप ही है ; क्योंकि विषयों में परिणाम दुःख , ताप दुःख और संस्कार दुःख मिला हुआ होता है ; और तीनों गुणों के सदा अस्थिर रहने के कारण उनकी सुख – दुःख और मोह रुपी वृत्तियाँ भी बदलती रहती है |

इसलिए सुख के पीछे दुःख का होना आवश्यक है |

दुःख के नितांत अभाव का उपाय निर्मल अडोल विवेक ख्याति है |

विवेकख्याति की सात प्रकार की सबसे ऊँची अवस्थावाली प्रज्ञा होती है |

(१) जो कुछ जानना था जान लिया ( दुःख का कारण ) – अब कुछ जानने योग्य नहीं रहा | अर्थात जितना गुणमय दृश्य है वह सब परिणाम, ताप और संस्कार दुःखों से दुःख स्वरुप ही है | इसलिए ‘हेय’ है |

(२) जो कुछ करना था दूर कर दिया ( – अब कुछ दूर करने योग्य नहीं रहा | अर्थात द्रष्टा और दृश्य का संयोग जो ‘ हेय हेतु ‘ है वह दूर कर दिया |

(३) जो कुछ साक्षात करना था कर लिया , अब कुछ साक्षात करने योग्य नहीं रहा | अर्थात निरोध समाधि द्वारा ‘ हान ‘ को साक्षात कर लिया |

(४) जो कुछ करना था कर लिया | अब कुछ करने योग्य नहीं रहा | अर्थात अविप्लव विवेक – ख्याति सम्पादन कर लिया |

(५) चित्त ने अपने भोग अपवर्ग दिलाने का अधिकार पूरा कर दिया , अब कोई अधिकार शेष नहीं रहा |

(६) चित्त के गुण अपने भोग अपवर्ग का प्रयोजन सिद्ध करके अपने कारण में लीं हो रहे है |

(७) गुणों से पर हो कर शुद्ध परमात्मा अवस्थिति हो रही है |

योग के आठ अंग

निर्मल विवेक ख्याति जिसे ‘ हान’ का उपाय बतलाया है उसकी उत्पत्ति का साधन अष्टांग योग है | अर्थात योग के आठ अंगों के अनुष्ठान से – अशुद्धि के क्षय होने पर – ज्ञान की दीप्ति – विवेक – ख्याति पर्यन्त बढ़ जाती है |

योग के आठ अंग – याम, नियम, आसन , प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि है |

साधनपाद में योग के पाँच बहिरंग साधन यम , नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार बतलाये गए है |

विभूतिपाद में उसके अन्तरंग धारणा , ध्यान, समाधि का निरूपण करते है |

३. विभूतिपाद – धारणा, ध्यान और समाधि – तीनो मिलकर संयम कहाते है | इस संयम के विनियोग से नाना प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो सकती है | ये सिद्धियां – श्रद्धालुओं के योग में श्रद्धा बढ़ाने में और विक्षिप्त ( असमाहित ) चित्त वालों के चित्त को एकाग्र करने में सहायक होती है , किन्तु इन्समे आसक्ति नहीं होनी चाहिए |

योगमार्ग पर चलने वाले के लिए नाना प्रकार के प्रलोभन आते है | अभ्यासी को उनसे सावधान रहना चाहिए , उसमे फँसने से और घमंड से बचे रहना चाहिए | स्थान वालों के आदर भाव करने पर लगाव और अभिमान नहीं करना चाहिए | चित्त और पुरुष के भेद जानने वाला सारे भावों के अधिष्ठातृत्त्व और सर्वज्ञातृत्त्व को प्राप्त होता है | किन्तु योगी को उनमे भी अनासक्त रह कर अपने असली ध्येय की ओर बढ़ना चाहिए | उसमे भी वैराग्य होने पर , दोषों का बीज क्षय होइन पर , कैवल्य होता है |

४. कैवल्यपाद – इसमें चित्त और चित्त के सम्बन्ध में जो जो शंकाएँ हो सकती है , उनका युक्ति पूर्वक निवारण किया है |

चित्त की नौ अवस्थाएँ –

(१) जाग्रत – अवस्था – सत्त्व गुण गौणरूप से दबा रहता है | तम , सत्त्व को वृत्ति के यथार्त रूप के दिखलाने से रोकता है | रज प्रधान हो कर चित्त को इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों में उपरक्त करने में समर्थ होता है |

(२) स्वप्नावस्था – सत्त्व गुण , गौणतर रूप से दबा रहता है | तम , रज को इतना दबा लेता है किवह चित्त को इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों में उपरक्त नहीं कर सकता है | किन्तु रज की क्रिया सूक्ष्म रूप से होती रहती है , जिससे वह चित्त को – मन द्वारा – स्मृति के संस्कारों में – उपरक्त करने में समर्थ रहता है |

(३) सुषुप्ति अवस्था – सत्त्व गुण , गौणतम रूप से दब जाता है | तमोगुण , रजोगुण की स्वप्नावस्था वाली क्रियाओं को भी रोक कर प्रधान रूप से चित्त पर फ़ैल जाता है | इसलिए किसी विषय का किसी प्रकार भी ज्ञान नहीं रहता परन्तु किसी विषय के ज्ञान न होने की प्रतीति होती रहती है , अर्थात रज का नितांत आभाव नहीं होता , वह कुछ अंश में बना ही रहता है |

(४) प्रलयावस्था – प्रलय में चित्त के अवस्था सुषुप्ति जैसी होती है , केवल भेद इतना है कि – प्रलय समष्टि चित्त कि सुषुप्ति है – जबकि यह सुषुप्ति – व्यष्टि चित्त की इसमें जीव गाढ़ निद्रा जैसे अवस्था में रहता है |

(५) समाधि प्रारम्भ अवस्था – तमोगुण गौणरूप से रहता है | रजो गुण को चित्त को चलायमान करने की क्रिया निर्बल होती है | सत्त्व गुण प्रधान हो कर चित्त को एकाग्र करने और वास्तु को यथार्त रूप को दिखलाने में समर्थ होता है |

(६) सम्प्रज्ञात समाधि ( एकाग्रता) – तमोगुण गौणतर रूप में दबा रहता है | सत्त्व गुण रजोगुण को दबा कर प्रधानरूप से अपना प्रकाश करता है , जिससे चित्त वास्तु के तदाकार हो कर उसका यथार्त रूप दिखलाने में समर्थ होता है | स्थूल शरीर में कार्य बंद हो कर सूक्ष्म शरीर में एकाग्र वृत्ति रहती है |

(७) विवेकख्याति – सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञात समाधी के बीच की अवस्था | तमो गुण गौणतम रूप में नाम मात्र रहता है | सतत गुण का प्रकाश पूर्णतया फ़ैल जाता है | रजोगुण केवल इतना रहता है कि जिससे , पुरुष को चित्त से भिन्न दिखलाने की क्रिया हो सके और तम इस वृत्ति को रोकने मात्र रह जाता है |

(८) असम्प्रज्ञात समाधि ( स्वरूपवास्थि ) – सत्त्व चित्त में बाहर से तीनोंगुणों का वृत्ति रूप परिणाम होना बंद हो जाता है | चित्त में केवल निरोध परिणाम अर्थात संस्कार शेष रहते है , जिनके दुर्बल होने पर उसे फिर व्युत्थान दशा में आना पड़ता है |

(९) प्रतिप्रसव – चित्त को बनाने वाले गुणों की अपने कारणों में लीं होने की अवस्था | चित्त में निरोध परिणाम अर्थात संस्कार भी निवृत्त हो जाते है और पुरुष शुद्ध कैवल्य परमात्मा स्वरुप में अवस्थित हो जाता है |

इनको चित्त की क्षिप्त – विक्षिप्त आदि पाँच भूमियों के विषय से पृथक समझना चाहिए |

CHitt ki paanch avasthayen

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