योग ( ज्ञान योग , उपासना योग और कर्मयोग ) का वास्तविक स्वरुप –

योग सांख्य का ही क्रियात्मक रूप है |

योग सारे सम्प्रदायों और मत – मतान्तरों के पक्षपात और वाद- विवाद से रहित सार्वभौम धर्म है, जो तत्त्व का ज्ञान स्वयं अनुभव द्वारा प्राप्त करना सिखलाता है और मनुष्य को उसके अंतिम ध्येय तक तक पहुँचाता है |

योग के सम्बन्ध में नाना प्रकार की फैली हुई भ्रांतियों ले निवारणार्थ उसके वास्तविक स्वरुप को समझा देना आवश्यक है |

मोटे शब्दों में योग स्थूलता से सूक्ष्मता की और जाना अर्थात बाहर से अन्तर्मुख होना है |

चित्त की वृत्तियों द्वारा हम स्थूलता की ओर जाते हैं अर्थात अन्तर्मुख होते है |

आत्मतत्त्व से प्रकाशित चित्त , अहंकार रूप वृत्ति द्वारा ,

अहंकार , इंद्रियों और तन्मात्राओं रूप वृत्तियों द्वारा ,

तन्मात्राएँ , सुक्ष्म और स्थूलभूत और इंद्रियां विषयों की वृत्तियों द्वारा बहिर्मुख हो रही हैं|

जितनी वृत्तियाँ बहिर्मुख होती जाएंगी उतनी ही उसमें रज और तम की मात्रा बढ़ती जायेगी और

उससे उलटा जितनी वृत्तियाँ अन्तर्मुख होती जाएंगी उतना ही रज और तम के तिरोभाव पूर्वक सत्त्व का प्रकाश बढ़ता जाएगा |

जब कोई भी वृत्ति न रहे तब शुद्ध पर्मात्मास्वरूप शेष रह जाता हैं |

योग के मुख्य तीन अंतर्विभाग किये जा सकते हैं – ज्ञान योग , उपासना योग और कर्मयोग |

ज्ञान योग – भौतिक पदार्थों का जान लेना अर्थात सांसारिक ज्ञान और विज्ञान , ज्ञानयोग नहीं हैं | बल्कि तीन गुणों और उससे बने हुए सारे पदार्थों से परे ( अर्थात :-

स्थूल, सूक्ष्म, और कारण शरीर तथा

स्थूल, सूक्ष्म, और कारण जगत अथवा

अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष अथवा

शरीर , इंद्रियों, ,मन, अहंकार और चित्त से परे

गुणातीत शुद्ध परमात्मा को जिसके द्वारा इन सब में ज्ञान, नियम, और व्यवथपूर्वक क्रिया हो रही हैं ,

संशय , विपर्यय रहित

पूर्ण रूप से जान लेना ज्ञान योग हैं |

यह ज्ञान केवल पुस्तक पढ़ लेने से या शब्दों द्वारा सुन लेने मात्र से ही नहीं प्राप्त हो सकता |

उसके लिए उपासना योग की आवश्यकता होती हैं |

उपासना योग – एक प्रत्यय का प्रवाह करना अर्थात चित्त की वृत्तियों को सब ओर से हटाकर केवल एक लक्ष्य पर ठहराने का नाम उपासना हैं |

किसी सांसारिक विषय की प्राप्ति के लिए इस प्रकार एक प्रत्यय का प्रवाह करना उपासना कहा जा सकता हैं उपासना योग नहीं |

यह उपासना योग तभी कहलायेगा जब इसका मुख्य लक्ष्य शुद्ध परमात्मा तत्त्व की प्राप्ति हो |

Yog 1 Upaasanaa yog Yog 2 Karmyog Yog 3 Roopak dwara yog ke bhed YOg 4 Manoranjak udaaharanon dwara yog ke swaroop

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