पूर्व मीमांसा ( मीमांसा दर्शन )

 

पूर्वमीमांसा श्री वेदव्यास जी के शिष्य जैमिनी मुनि ने प्रवृति मार्गी गृहस्थियों तथा कर्मकाण्डियों के लिए बनायी हैं | इसको जैमिनी दर्शन भी कहते हैं |

 

 

(पूर्व) मीमांसा के अनुसार धर्म की व्याख्या – वेदविहित शिष्टों से आचरण किये हुए कर्मों में अपना जीवन ढालना हैं | इसमें सब कर्मों को यज्ञों / महायज्ञों के अंतर्गत कर दिया गया हैं | पूर्णिमा तथा अमावस्या में जो छोटी-छोटी इष्टियाँ की जाती हैं इनका नाम यज्ञ और अश्वमेघ आदि यज्ञों का नाम महायज्ञ है |

 

 

१. ब्रह्मयज्ञ – प्रातः और सांयकाल की संध्या तथा स्वाध्याय |

 
२. देवयज्ञ – प्रातः और सांयकाल का हवन |

 
३. पितृयज्ञ – देव और पितरों की पूजा अर्थात माता, पिता, गुरु आदि की सेवा तथा उनके प्रति श्रद्धा – भक्ति |

 
४. बलिवैश्वदेवयज्ञ – पकाये हुए अन्न में से अन्य प्राणियों के लिए भाग निकालना |

 
५. अतिथि यज्ञ – घर पर आये हुए अतिथियों का सत्कार |

 

 

– ये यज्ञ के अवान्तर भेद है |

 

 

ये यज्ञ और महायज्ञ वेदों में बतलायी हुई विधि के अनुसार होने चाहिए | इसलिए जैमिनी मुनि ने इनकी सिद्धि के लिए ‘शब्द’ अर्थात ‘आगम’ प्रमाण ही माना हैं जो वेद हैं |

 

 

वेद के पांच प्रकार के विषय है –

 

 

१. विधि – ‘स्वर्गकामो यजेत ‘ ‘स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करें’ इस प्रकार के वाक्यों को ‘विधि’ कहते हैं |

 
२. मंत्र – अनुष्ठान के अर्थ स्मारक वचनों को ‘मंत्र’ नाम से पुकारते हैं |

 
३. नामधेय – यज्ञ के नाम की ‘नामधेय’ संज्ञा हैं |

 
४. निषेध – अनुचित कार्य के विरत होने को ‘निषेध’ कहते हैं |

 
५. अर्थवाद – किसी पदार्थ के सच्चे गुणों के कथन को ‘अर्थवाद’ कहते हैं |

 

 

इन पांच विषयों के होने पर भी वेद का तात्त्पर्य विदिवक्यों में ही हैं | अन्य चारों विषय उनके केवल अंग भूत हैं तथा पुरुषों को अनुष्ठान के लिए उत्सुक बनाकर विधिवाक्यों को ही संपन्न किया करते हैं |

 

 

विधि चार प्रकार की होती हैं –

 

 

१. कर्म के स्वरूपमात्र को बतलाने वाली विधि ‘उत्पत्ति विधि’ हैं |

 
२. अंग तथा प्रधान अनुष्ठानों के सम्बन्ध बोधक विधि को ‘विनियोग विधि’ ,

 
३. कर्म से उत्पन्न फल के स्वामित्व को कहलाने वाली विधि को ‘अधिकार-विधि’ तथा

 
४. प्रयोग के प्राशुभाव ( शीघ्रता ) के बोधक विषय को ‘प्रयोगविधि’ कहते हैं |

 

 

विध्यर्थ के निर्णय करने में सहायक श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान तथा समाख्या नामक शठ प्रमाण होते हैं |

 

 

जैमिनी मुनि के अनुसार यज्ञों से ही स्वर्ग अर्थात ब्रह्म की प्राप्ति होती हैं |

 

 

वेदों के कर्मकाण्ड – प्रतिपादक वाक्यों में जो विरोध प्रतीत होता हैं , केवल उसके वास्तविक अविरोध को दिखलाने के लिए पूर्व मीमांसा की रचना की गयी हैं |

 

 

हानोपाय – इसी प्रकार जहाँ उत्तरमीमांसा में ‘हानोपाय’ अर्थात मुक्ति का साधन, ज्ञानियों तथा सन्यासियों किए लिए, ज्ञान द्वारा तीसरे तत्त्व अर्थात परमात्मा की उपासना बतलायी गयी है ,

 

वहॉं पूर्वमीमांसा में कर्मकाण्डी गृहस्थियों के लिए यज्ञों द्वारा व्यष्टि रूप से उसी ब्रह्म की उपासना बतलायी गयी है |

 

 

 

 

मीमांसकों के मोक्ष की परिभाषा इन शब्दों में हैं –

 

इस जगत के साथ आत्मा के शारीर , इंद्रिय और विषय –

 

इन तीन प्रकार के सम्बन्ध के विनाश का नाम मोक्ष हैं ;

 

क्योंकि इन बंधनों ने ही पुरुष को जकड रखा हैं |

 

इस त्रिविध बांध के आत्यन्तिक नाश की संज्ञा मोक्ष हैं |

 

सांख्य और योग के अनुसार यह सम्प्रज्ञात समाधि का अंतिम ध्येय हैं |

 

 

(पूर्व) मीमांसा ग्रन्थ सब दर्शनों में सबसे बड़ा हैं |

 

इसके सूत्रों की संख्या २६४४ तथा अधिकरणों के ९०९ हैं जो की अन्य सब दर्शनों के सूत्रों की सम्मिलित संख्या के बराबर हैं |

 

 

द्वादश अध्यायों में धर्म के विषय में ही विस्तृत विचार किया गया हैं |

 
पहले अध्याय का विषय हैं – धर्मविषयक प्रमाण ,
दूसरे का भेद,
तीसरे का अङ्गत्व,
चौथे का प्रयोज्य-प्रायोजक भाव ,
पांचवे का क्रम अर्थात कर्मों के आगे-पीछे होइन के निर्देश ,
छठे का अधिकार ( यज्ञ करने वाले पुरुष के योग्यता ) ,
सातवें तथा आठवें का अतिदेश ( एक कर्म की समानता पर अन्य कर्म का विनियोग ),
नवें का ऊह ,
दसवें का बाघ,
ग्यारहवें का तन्त्र, तथा
बारहवें का विषय प्रसंग हैं |

 

पूर्व मीमांसा पर सबसे प्राचीन वृत्ति आचार्य उपवर्ष की हैं |

 

Leave a Reply