मानव-जीवन की पूर्णता ?

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दिल्ली में श्री कृष्णमूर्ति जी जहाँ ठहरे थे वहाँ श्री स्वामीजी महाराज पहुँचे । श्री कृष्णमूर्ति जी ने अत्यन्त आदर और स्नेह के साथ स्वामीजी का स्वागत किया तथा अपनी विशेष कुर्सी पर ही स्वामीजी को बैठाया स्वयं एक साधारण सी कुर्सी पर बैठ गए । दुभाषिए के माध्यम से बात-चीत आरम्भ हुई ।

श्री स्वामीजी महाराज ने कहा, ” आप प्रत्येक बात का निषेध करते जाते है तो क्या आप अभाव को स्वीकार करते है ? “

श्री कृष्णमूर्ति जी ने तुरन्त कहा, ” नहीं, नहीं लाइफ है लाइफ है ।” इस पर श्री महाराज जी ने कहा, ” जिसे आप लाइफ (जीवन) कहते हैं उसे यदि मैं परमात्मा कहूँ तो आपको कोई आपत्ति है ? ” सुनकर श्री कृष्णमूर्ति जी मौन हो गए उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। बाद में इस भेंट की चर्चा करते हुए श्री स्वामीजी महाराज ने बताया कि कृष्णमूर्ति जी ने जो अन्तिम पुस्तक लिखी है उसमें कहा है कि,  ” प्रेम की जागृति ही मानव के विकास की चरम सीमा है ।” यानी प्रेम प्राप्ति मानव जीवन की चरम सीमा है । तो भैया ! प्रेम प्राप्ति तो तभी न होगी, जब कोई प्रेमास्पद होगा ? प्रेम-प्राप्ति बिना प्रेमास्पद के हो जायगी क्या ?

तो इस तरह से उन्हों ने भी अपनी थीसिस में, अपनी खोज में परमात्मा की ओर संकेत किया है ।

 

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