न्याय – दर्शन

न्याय – दर्शन – न्याय सूत्र के रचयिता का गोतम ( गोत्र नाम गोतम ) है और व्यक्तिगत नाम अक्षपाद है |

विभिन्न प्रमाणों की सहायता से वस्तुतत्त्व की परीक्षा न्याय हैं |
न्यायसूत्र पांच अध्यायों में विभक्त है | इनमे षोडश पदार्थों के उद्देश्य तथा लक्षण परिक्षण किये गए है –

१. प्रमाण – ये मुख्य चार हैं – प्रत्यक्ष , अनुमान , उपमान एवं आगम |
२. प्रमेय – ये बारह है – आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ , बुद्धि / ज्ञान / उपलब्धि , मन, प्रवृत्ति , दोष, प्रेतभाव , फल, दुःख और उपवर्ग |
३. संशय
४. प्रयोजन
५. दृष्टान्त
६. सिद्धांत – चार प्रकार के है : सर्वतंत्र सिद्धांत , प्रतितन्त्र सिद्धांत, अधिकरण सिद्धांत और अभुपगम सिद्धांत |
७. अवयव
८. तर्क
९. निर्णय
१० वाद
११ जल्प
१२ वितण्डता
१३. हेत्वाभास – ये पांच प्रकार के होते है : सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम, साध्यसम और कालातीत हेत्वाभास |
१४. छल – वाक छल , सामान्य छल और उपचार छल |
१५. जाती
१६. निग्रहस्थान

वैशेषिक और न्याय , इन दोनों दर्शनों के अनुसार आत्मा, आकाश, काल, दिशा, मन और परमाणु ( वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के) नित्य हैं; और शरीर, इन्द्रियाँ, चारों स्थूलभूत ( पृथ्वी, जल. अग्नि, वायु और इनसे बनी साड़ी सृष्टि ) अनित्य हैं |

इन दोनों दर्शनों ने सांख्ययोग के सदृश परमात्मा तत्त्व को आत्मतत्त्व में सम्मिलित का दिया हैं अर्थात उसक अलग वर्णन नहीं किया हैं | इससे यह सिद्ध होता हैं कि इन्होने परमात्मा तत्त्व को अस्वीकार नहीं किया हैं |

इसका कारण यह हैं कि इन दोनों दर्शनों ने वेदांत दर्शन के सम्मान –
‘हेयहेतु’ अर्थात दुःख का कारण अविद्या , मिथ्या ज्ञान या अविवेक माना हैं ;
‘हान’ अर्थात दुःख का अत्यंत अभाव स्वरुप अवस्थिति , अपवर्ग , निःश्रेय या ब्रह्मप्राप्ति बतलाया हैं ; किन्तु
‘हानोपाय’ अर्थात दुखनिवृत्ति का साधन जहाँवेदान्त में ब्रह्म ज्ञान बतलाया हैं वहाँइन दोनों दर्शनों ने जड़ और चेतन तत्त्व का विवेक अर्थात तत्त्व ज्ञान माना हैं |

सोलह पदार्थो के तत्त्व ज्ञान से मिथ्या अर्थात अविद्या का नाश होता हैं | मिथ्या ज्ञान के नाश से ( राग, द्वेष, मोह) दोषोंका नाश होता हैं | दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश होता है | प्रवृत्ति के नाश से जन्म का न मिलना और जन्म के न मिलने से सब दुखो का अभाव होता है | सब दुखों का अभाव ही अपवर्ग है |

योग दर्शन और सांख्य दर्शन ने बुद्धि अर्थात चित्त को पृथक तत्त्व माना है , किन्तु न्याय दर्शन और वैशिषिक दर्शन ने इसको आत्मा में ही सम्मिलित करके आत्मा के शबल स्वरुप के धर्म , ज्ञान, प्रयत्न आदि बतलाये है |

आत्मा तथा परमात्मा का अस्तित्व प्रमाण और लक्षण से सिद्ध करने के पश्चात इन दोनों दर्शनकारों ने न केवल आत्मा और परमात्मा का , किन्तु अतीन्द्रिय जड़ पदार्थों का भी वास्तविक स्वरुप जानने के लिए योग साधना का ही सहारा बतलाया है |

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