शुद्ध मन्त्र

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“हर भज सब तज”

अर्थात

सब (इच्छायें) त्याग  दो , (प्रभु) का भजन करो

यह  मन्त्र शुद्ध  है , इसमें मात्रा का भी विकार नहीं  है !

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