धर्म के पाँच आधार

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तुम्हारे हृदय की करुणा ने ये निर्णय करवाया है । और करुणा तो धर्म का आधार है । मैनें तुम्हे जो पाँच पत्थर दिये थे द्रौपदी वो धर्म का उप्देश था, धर्म का आदेश तो दिया हि नहीं जाता । किन्तु तुमने धर्म के उन उन पाँच आधारों को हृदय में स्थान दिया । त्याग बुद्धी को स्थिर करता है, धीरज मन को स्थिर करता है, प्रेम हृदय को स्थिर करता है और समर्पण शरीर के आवेगों को शान्त कर शरीर को स्थिर करता है , और न्याय ! न्याय आत्मा को स्थिर करता है । मन, बुद्धी, हृदय, शरीर और आत्मा ये पाँचों धर्म के आधार जब शान्त और स्थिर हो जाते हैं, तो मनुष्य करुणा से भर जाता है, जिसे धर्म कहते है । और तुम्ने उसी धर्म के आधार पर ये निर्णय किया है द्रौपदी । इसलिये ये कार्य तुम्हारे और केवल तुम्हारे लिये पाप नहीं है ।

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