दर्शन: क्या हैं ?

दर्शन: –

वेदों में बतलाये हुए ज्ञान की मीमांसा दर्शनशास्त्रों में मुनियों द्वारा सूत्र रूप में की गयी हैं |

 

दर्शन शब्द का अर्थ हैं ‘जिसके द्वारा देखा जाय’ अर्थात वस्तु का तात्त्विक स्वरुप जाना जावे |

 

 

प्राणी मात्र की दुःख निवृत्ति की ओर प्रवृत्ति

 

छोटे से छोटे कीट से लेकर बड़े-से-बड़े सम्राट तक प्रतिक्षण तीनों प्रकार के

 

आध्यात्मिक , आधिदैविक और आधिभौतिक दुखों में से किसी-न-किसी दुःख की निवृत्ति का ही यत्न करते रहते हैं ;

 

फिर भी दुखों से छुटकारा नहीं मिलता |

 

मृगतृष्णा के सदृश जिन विषयों के पीछे मनुष्य सुख समझकर दौड़ता हैं , प्राप्त होने पर वे दुःख ही सिद्ध होते हैं |

 

 

इसलिए तत्त्वदर्शी के लिए निम्न चार प्रश्न उपस्थित होते हैं –

 

 

दर्शनों के चार प्रतिपाद्य विषय

१. हेय – दुःख का वास्तविक स्वरुप क्या हैं , जो ‘हेय’ अर्थात त्याज्य है ?
२. हेयहेतु – दुःख कहाँ से उत्पन्न होता है , इसका वास्तविक कारण क्या है , जो ‘हेय’ अर्थात त्याज्य दुःखका वास्तविक ‘हेतु’ है |
३. हान – दुःख का नितान्त अभाव क्या है , अर्थात ‘हान’ किस अवस्था का नाम है ?
४. हानोपाय – हानोपाय अर्थात नितान्त दुःखनिवृत्ति का साधन क्या है ?

 

 

इन प्रश्नों पर विचार करते हुए तीन बातें और उपस्थित होती हैं –

 

 

तीन मुख्य तत्त्व

१. चेतनतत्व : आत्मा , पुरुष (जीव) – दुःख किसको होता हैं ? जिसको दुःख होता हैं उसका वास्तविक स्वरुप क्या है ?

 

यदि उसका दुःख वास्तविक धर्म होता तो वह उससे बचने का प्रयत्न ही न करता |

 

इससे प्रतीत होता है कि वह कोई ऐसा तत्त्व है , जिसका दुःख और जड़ता स्वाभाविक धर्म नहीं है |

 

वह चेतनतत्त्व है |

 

इस चेतन – आत्मा (पुरुष) के पूर्ण ज्ञान से तीसरा प्रश्न ‘हान’ सुलझ जाता है |

 

अर्थात आत्मा के यथार्तरूप के साक्षात्कार – ‘ स्वरुपिस्थिति’ से दुःख का नितान्त अभाव हो जाता है |

 

 

२. जडतत्त्व :  प्रकृती 

से भिन्न , इसके विपरीत , किसी और तत्त्व के मानने की भी आवश्यकता होती है , जिसका धर्म दुःख है , जहाँ से दुःख की उत्पत्ति होती है और जो इस चेतनतत्त्व से विपरीत धर्मवाला है |

 

वो जडतत्त्व है , जिसको प्रकृति , माया आदि कहते हैं |

 

इसके यथार्थरूप को समझ लेने से पहला और दूसरा दोनों प्रश्न सुलझ जाते हैं |

 

अर्थात दुःख इसी जड़तत्त्व का स्वाभाविक गुण है न की आत्मा का |

 

 

जड और चेतनतत्त्व में आसक्ति तथा अविवेकपूर्ण संयोग ही ‘हेय’ अर्थात त्याज्य दुःख का वास्तविक स्वरुप है और –

 

 

चेतन तथा जड़तत्त्व का मिथ्या ज्ञान या अविद्या ‘हयहेतु’ अर्थात त्याज्य दुःख का कारण है |

 

 

चेतन और जडतत्त्व का विवेकपूर्ण ज्ञान ‘हानोपाय’ – दुःखनिवृत्ति का मुख़्य साधन है |

 

 

३. चेतनतत्त्व :

 

परमात्मा , पुरुषविशेष (ईश्वर , ब्रह्म) – इन दोनों चेतन और जडतत्त्वों को मानने के साथ एक तीसरे तत्त्व को भी मानना आवश्यक हो जाता है , जो –
पहले चेतन तत्त्व की सर्वांश अनुकूल हो और
दूसरे जडतत्त्व की विपरीत हो ,

 

अर्थात
जिसमें पूर्ण ज्ञान हो ,
जो सर्वज्ञ हो ,
सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हो ,
जिसमें दुःख ,
जडता और अज्ञान का नितान्त अभाव हो ,
जहाँ तक आत्मा का पहुँचना आत्मा का अंतिम ध्येय हो ,
जो ज्यान का पूर्ण भण्डार हो ,
जहां से ज्ञान पाकर आत्मा जड चेतन का विवेक प्राप्त कर सके और
अविद्या के बंधनों को तोड़कर
‘हेय’ दुःख से सर्वथा मुक्ति पा सके |

 

इस तर्क की द्वारा हमें तीसरे और चौथे दोनों प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है , अर्थात यही ‘हान’ है और ‘हानोपाय’ भी हो सकता है |

 

 

षड्दर्शन

इन चारों रहस्यपूर्ण प्रश्नों को समझाने की लिए ‘ दर्शनशास्त्रों ‘ में इन तीनों तत्वों का छोटे-छोटे और सरल सूत्रों में युक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है |

 

 

इन दर्शनों में छःदर्शन ( षड्दर्शन ) मुख्य हैं , जो वेदों के उपाङ्ग कहलाते हैं |

 

 

१. मीमांसा ,
२. वेदांत ,
३. न्याय ,
४. वैशेषिक ,
५. सांख्य ,
६. योग |

वेदों के अंग

१. शिक्षा – जिसका उपयोग वैदिक वर्णों , स्वरों और मात्राओं के बोध कराने में होता हैं |
२. कल्प – जो आश्वलायन , आपस्तम्ब , बौधायन और कात्यायन आदि ऋषियों के बनाये श्रौतसूत्र , गृहसूत्र , धर्मसूत्र हैं जिनमेंयागके प्रयोग , मन्त्रों के विनियोग की विधि है |
३. व्याकरण – जो प्रकृति और प्रत्यय आदि के उपदेश से पद के स्वरुप और उसके अर्थ का निश्चय करने के लिए उपयोगी है |
४. निरूक्त – जो पदविभाग, मंत्र का अर्थ और देवता के निरूपण द्वारा एक एक पद के संभावित और अवयवार्थ का निश्चय करता है |
५. छंद – जो लौकिक और वैदिक पादों की अक्षर – संख्या को नियमित करके , पाद , यति और विराम आदि की व्यवस्था करने में उपयोगी है |
६. ज्योतिष – जो यज्ञादि – अनुष्ठान के कालविशेष की व्यवस्था करता है |

 

 

ये वेदों के अंग कहलाते हैं | अर्थात इनके द्वारा वेदमंत्रों के अर्थों का यथार्थ बोध प्राप्त होता हैं |

 

 

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