कैवल्यपाद

कैवल्यपाद (पातञ्जलयोगप्रदीप – योगदर्शन)

जन्म, ओषधि, मन्त्र, तप और समाधि से उत्पन्न होने वाली सिद्धियां हैं ||१||

एक जाती से दूसरी जाती में बदल जाना प्रकृतियों के भरने से होता है ||२||

धर्मादि निमित्त प्रकृतियों का प्रेरक नहीं होता है, उससे किसान के सदृश रुकावट दूर होती है ||३||

अस्मिता मात्र से निर्माण – चित्त होते हैं ||४||

प्रवृत्ति के भेदों में एक चित्त अनेकों का प्रेरक वाला होता हैं ||५||

उन पांच प्रकार के जन्म, ओषधि आदि से उत्पन्न हुए पाँचों निर्माणसिद्ध – चित्तों में से समाधि से उत्पन्न होने वाला चित्त वासनाओं से रहित होता हैं ||६||

योगी का कर्म अशुक्लाकृष्ण ( न शुक्ल न कृष्ण अर्थात निष्काम ) होता हैं, दूसरों का तीन प्रकार का ( पाप, पुण्य, और पाप-पुण्य मिश्रित ) होता हैं ||७||

उन तीन प्रकार के कर्मों से उनके फल के अनुकूल ही वासनाओं की अभ्व्यक्ति ( प्रादुर्भाव) होती है ||८||

जाती, देश और कालकृत व्यवधान वाली वासनाओं का भी व्यवधान नहीं होता ; क्योंकि स्मृति और संस्कार एकरूप ( समानविषयक ) होते हैं ||९||

उन वासनाओं को आशीष ( अपने कल्याण की इच्छा ) के नित्य होने से अनादित्व भी है ||१०||

हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन से वासनाओं के संगृहित होने से इनके ( हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन ) अभाव से उन ( वासनाओं ) का अभाव होता है ||११||

अतीत और अनागत स्वरुप से रहते हैं , क्योंकि धर्मों का काल से भेद होता है ||१२||

वे धर्म प्रकट और सूक्ष्म गुणस्वरूप हैं ||१३||

परिणाम के एक होने से वस्तु की एकता होती है ||१४||

वास्तु के एक होने पर भी व्हीट के भेद से उन दोनों ( चित्त और वस्तु ) का अलग -अलग मार्ग है ||१५||

ग्राह्य वस्तु एक चित्त के अधीन नहीं है , क्योंकि वह ( वस्तु) बिना प्रमाण ( चित्त) के उस समय के होगी ? ||१६||

चित्त को वस्तु के जानने में उसके उपराग ( विषय का चित्त में प्रतिबिंब पड़ना) की अपेक्षा होती है इसलिए उसको ( चित्त को ) वस्तु ज्ञात और अज्ञात होती है ||१७||

चित्त का स्वामी पुरुष परिणामी नहीं है, इसलिए चित्त की वृत्तियां उसे सदा ज्ञात रहती हैं ||१८||

चित्त स्वप्रकाश नहीं है ; क्योंकि वह दृश्य है ||१९||

और एक समय में दोनों विषय और चित्त का ज्ञान नहीं हो सकता ||२०||

यदि पहले चित्त को दूसरे चित्त का दृश्य माना जाय तो चित्त (ज्ञान) के चित्त ( ज्ञान) का अनवस्था दोष होगा और स्मृतियों का संकर भी हो जाएगा ||२१||

पुरुष को , जो क्रिया अथवा परिणाम रहित है , स्वप्रतिबिम्बित चित्त के आकार की प्राप्ति होने पर अपने विषयभूत चित्त का ज्ञान होता है ||२२||

द्रष्टा और दृश्य से रँगा हुआ चित्त सारे अर्थों वाला होता है ||२३||

चित्त अनगिनत वासनाओं से चित्रित हुआ भी परार्थ है ; क्योंकि वह संहत्यकारी है ||२४||

विवेकख्याति द्वारा पुरुष और चित्त में भेद के देखने वाले की आत्मा भाव की भावना निवृत्त हो जाती है ||२५||

विशेषदर्शन के उदय होने पर विशेषदर्शी का चित्त विवेक-मार्ग-संचारी हो कर कैवल्य के अभिमुख होता है ||२६||

उस विवेक-ज्ञान के बीच-बीच में अन्य व्युत्थान के वृत्तियाँ (भी) ( पूर्व के व्युत्थान के) संस्कारों से उदय होती है ||२८||

जो योगी प्रसंख्यान ज्ञान से भी विरक्त है उसको निरन्तर विवेक – ख्याति के उदय होने से धर्ममेघ समाधि होतो है ||२९||

उस धर्ममेघ समाधि से क्लेश और कर्मों की निवृत्ति होती है ||३०||

तब सब क्लेशकर्मों के क्षय – काल में सर्व आवरण रूप मलों से रहित होकर चित्तरूप प्रकाश के अनन्त होने से ज्ञेय पदार्थ अल्प हो जाता है ||३१||

तब कृतार्थ हुए गुणों के परिणाम के क्रम की समाप्ति हो जाती है ||३२||

प्रतिक्षण होनेवाली परिणाम की समाप्ति पर जानी जानेवाली ( गुणों की अवस्था विशेष का नाम ) क्रम है ||३३||

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