औलिया, पीर, फकीर, हद, बेहद, अनहद, सबूरी, मगरूरी !

हद हद टपे सो औलिया,
बेहद टपे सो पीर
हद अनहद दोउ टपे सो वाको नाम फ़कीर
कबीरा, सो वाको नाम फ़कीर!

जो सुख पायो राम भजन में, सो सुख नाही अमीरी में ।
भला बुरा सब को सुन लीजै, कर गुजरान गरीबी में ॥

मन लागो मेरो यार फकीरी में ॥

प्रेम नगर में रहनी हमारी साहिब मिले सबूरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥
कहत कबीर सुनो भयी साधो साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥
प्रेम नगर में रहिनी हमारी, भलि बलि आई सबूरी में ।
हाथ में कूंडी, बगल में सोटा, चारो दिशा जगीरी में ॥

मन लागो मेरो यार फकीरी में ॥

आखिर यह तन ख़ाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरी में ॥

मन लागो मेरो यार फकीरी में ॥

हम न तो हुकूमत के बागी है और न किसी से कोई अदावत है ।

मुनि, दरवेश और फकीर की कीमत कोई भी समझ सकता है ।

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