ख्वाब शीशे के दुनियाँ पत्थर की

हम ना समझे थे बात इतनी सी
ख्वाब शीशे के दुनियाँ पत्थर की

आरज़ू हमने की तो हम पाये
रोशनी साथ लाई थी साये
साये गहरे थे, रोशनी हल्की

सिर्फ़ वीरानी, सिर्फ़ तनहाई
जिंदगी हम को ये कहाँ लाई
खो गयी हम से राह मंज़िल की

क्या कोई बेचे, क्या कोई बाँटे
अपने दामन में सिर्फ़ हैं काँटे
और दुकानें हैं सिर्फ़ फूलों की
 

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Brijesh

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