बकवास का भी कुछ तो मतलब होता है … There is always some sense in the nonsense …

छोटी – छोटी  बातें 

 

मंडी में से फल सब्जी खरीदने के नियम : ( Rules of buying vegetables in Mandi / market ) 

पहला नियम :

सिर्फ seasonal फल सब्जी ही खरीदें , वही आपके के लिए best है | जिस मौसम में शरीर की जो विशेष आयश्यकता है ईश्वर ने उसी मौसम के अनुकूल फल. सब्जी पैदा किये हैं | याने कि मंडी में जो सबसे ज्यादा quantity में available हो वही खरीदो, वो most सूटेबल तो है ही साथ में सस्ता भी होता है | जैसे सर्दी में तरबूज खाना मूर्खता है तो गर्मी में फूलगोभी या गाजर / मूली | क्योंकि गर्मी में बॉडी को ठंडा रखने के लिए पानी खूब चाहिए इसलिए तरबूज , खरबूजा , खीरा जैसी पानी से भरपूर चीजे बहुत लाभदायक हैं इसी प्रकार सर्दी में शरीर को गरम रखने के लिए blood circulation ज्यादा चाहिए इसलिए खून बढ़ने वाली हरी पत्तेदार सब्जियां खूब पैदा होती हैं |

दूसरा नियम :

जो सब्जी आप के आस पास पैदा होती है वो आपके लिए better है, बजाय उसके जो बहुत दूर से transport और import कर के लायी गयी हो | क्योंकि जिस हवा, मिटटी, पानी से आपका शरीर बना बना है उसी हवा मिटटी पानी कि पैदावार आपके लिए ज्यादा suitable है , वजाय विपरीत हवा, मिटटी, पानी में पैदा हुई फल सब्जी से |

तीसरा नियम :

देसी सब्जी कि nutritional value और taste दोनों ही non-देसी सब्जी कि मुकाबले बेहतर होता है | देसी दिखने में छोटी और artistic होती है जबकि non-देसी बड़ी बड़ी और attractive , उससे बचना चाहिए |

चौथा नियम :

सब्जी सुबह सुबह खरीदो, एक दम ताज़ा आती है सीधे खेतों से | शाम को सब्जी सस्ती तो मिलत्ती है लेकिन वो १२ घंटे पुरानी हो चुकी होती है और अगले दिन जब तक काम में लोगे तो एक दिन से ज्यादा बासी हो चुकी होती है | Morning walk सब्जी मंडी की ओर हो जाए तो क्या बुरा है ?

वाह रे विकास ! ( What a great Development ! )

दुनियाँ के सभी जीव जंतु खुले में शौच करते है | हज़ारों वर्षों से इंसान भी खुले में ही शौच करता था | आज तक तो कभी shit के डिस्पोजल के बारे में किसी ऋषि मुनि तक ने भी चिंता नहीं की | क्यों करते ? सुबह की shit शाम तक तो dry हो कर powder बन जाती है और फिर धीरे धीरे मिटटी में mix हो जाती है | गाय भैंस और बकरी की shit ( गोबर / मींगनी ) को तो हम लोग बड़ा ही सहेज कर खेतों में खाद की तरह काम में लेते है जिसकी मदद से अच्छी फसल अच्छी होती है | आदमी की shit भी खेतों में खाद का ही काम करती आयी थी , आब तक | फिर ये अचानक क्या हो गया शहरों में ?

खेत, मिटटी वाली जगह तो रही नहीं shit करने को, तो साहब क्या करें ? घर में ही करना खुरु कर दिया | फिर flush करने के नाम पर उसको पानी में घोल दिया | अब वो natural वे में तो सूख नहीं सकती | तो फिर बड़े बड़े गढ्ढे खोद कर septic tank में भरना शुरू कर दिया | जब हर घर में septic tank बनने से प्रॉब्लम हुई तो बड़े बड़े underground पाइप दाल कर उसे शहरों के बाहर नालों में transport काने लगे | फिर वो नाले सड़ने लगे | अब उन नालों से निकले shit को dispose करने के लिए नए नए उपाय होए लगे |

इस प्रोसेस को आज हम विकास कहते हैं |

१२ / २४ घंटे में प्राकृतिक disposal ऑफ़ waste के बजाय waist को पहले इस तरह कन्वर्ट करो की उसका नेचुरल disposal न होपाये और फिर उसे महीनों / सालों तक protect करो , इसे septic करो, और फिर उसे dispose करने के artificial और बेहद कठिन / महंगे उपाय ढूंढो |

फिर विकास के नाम पर ज्ञान बांटो |

नीम्बू की पहचान ! (good quality Lemon identification ) 

अच्छे और रसीले नीम्बू की पहचान है उसका छिलका ! छिलका जितना पतला होगा नीम्बू में उतना अधिक रास होगा | बहुत ज़्यादा पतले छिलके वाले नीम्बू को “कागज़ी” नीम्बू भी कहते है | यही नियम मौसम्मी पर भी लागू होता है |

वाह री सभ्यता !

ईश्वर ने जंगलों में रहने वाले पशु पक्षियों के साथ एक विशेष जानवर बनाया जिसे हम इंसान या मानव के नाम से जानते है | जंगलों में रहते हुए इंसान की शारीरिक क्षमताएँ इतनी तो थी की वो अपना जीवन कंदमूल , फलफूल खा कर या पशु पक्षियों का शिकार करके व्यतीत कर लेता था | और आज भी ये क्षमता कई देशों / प्रदेशों में देखने को मिलती है जहाँ के जंगलों में आदिवासी रहते हैं |

शिकार करने की जरूरी और पेड़ों से फल फूल खाने की आवश्यकता से आदिवासी शारीरक रूप से वहुत इस चुस्त दुरुस्त, तेज़ और शक्तिशाली होते है | जंगलों में रहते हुए, जंगली पेड़ पौधों द्वारा अपनी बीमारियों का उपचार करने के आयुर्वेदिक तरीके भी वो जानते है | नृत्य, संगीत, खेल, कूद की भी उनकी अपनी कलाएं है | संचार के अपने उनके प्राकृतिक तरीके है | अपनी रक्षा , सुरक्षा के उपाय भी वो जानते है | फिर भी हम उन्हें गए गुज़रे पिछड़े असभ्य / uncivilized मानते है |

तो फिर हम अपने आप को सभ्य / civilized किस वजह से कहते है ?

सभ्य / civilized पर्सन्स, शारीरिक श्रम न करना पड़े, उसके उपाय ढूंढते है | याने कुछ ऐसा करो के खाने का सामान इकठ्ठा हो जाए लंबे समय के लिए , रोज़ाना की रोज़ाना खाने पीने के व्यवस्था न करनी पड़े |

जैसे खेती करके साल भर के लिया धान / अनाज का भण्डारण करना | उसके लिए जंगल छोड़ कर मैदानी इलाकों में नदियों के किनारे आकर बसने लगे जहां भूमि उपजाऊ हो | बस दाना डाला अरे खेती शुरू | रोज़ाना के रोज़ाना भोजन के लिए मारा मारी बंद | सो धीरे धीरे शिकार करने की क्षमता भी ख़तम | सुरक्षा / शिकार या फल खाने के लिए पेड़ों पर चढ़ने के क्षमता भी कमज़ोर | This is the first achievement (?) of civilization |

चूँकि खेती की वजह से थोड़ा समय बचने लगा , तो उद्देश्य तो था कि खाली समय में आराम करेंगे / मौज करेंगे , परंतु ऐसा हुआ नहीं | अनाज को पैदा करके स्टोर करना और ट्रांसपोर्ट करना भी जरूरी हो गया | तो साहब प्रकृति से उत्पन्न पत्तों को जोड़ कर झोंपड़ी बनाने कर रहने के बजाय कच्चे पक्के घर बनने लगे | ट्रांसपोर्टेशन के लिए पहिये / गाड़ियों (बैल / घोडा गाड़ी आदि ) का आविष्कार हुआ |

मकान में रहने की आदत होने से शरीर की सर्दी गर्मी को tolerate करने की क्षमता में कमी होने लगी | गाडी में बैठे बैठे travel करने से दौड़ने / लंबी पैदल यात्रा काने की क्षमता में कमी आने लगी | अब तो बिना घर और वाहन के जीना असंभव सा हो चुका है | ये विकास का दूसरा अचीवमेंट (?) है |

घरों में रहने की आदत का ये असर हुआ की घर से बाहर भी प्रकृति के मौसम के अनुसार शरीर की जो adjustment capabilities थी वो काम होती गयी और फिर गर्म कपड़ों और सूती कपड़ों का क्रमशः सर्दी और गर्मी में उपयोग एक अति आवश्यक जरूरत बन गयी | ये तीसरा achievement (३) है , विकास का |

धीरे धीरे ये क्रम बढ़ता गया और जितनी हमारी शारीरिक क्षमतायें ख़त्म / कमज़ोर होती गयीं उतनी ही अधिक हमारी निर्भरता मानव निर्मित साधनाओं पर बढ़ती गयी, और उतना ही अधिक हम अपने आप को विकाशील / आधुनिक / forward मानते गये | और शारीरक रूप से सम्पूर्ण स्वस्थ, जंगल में प्रकृति के साथ जीवन बिताने वाले , कृत्रिम संसाधनों की दासता से मुक्त, उस स्वतंत्र आदिवासी को हम बैकवर्ड / असभ्य मानने लगे |

वाह से विकास ! वाह री सभ्यता !!

प्रलय कब होगा ? When will the Holocaust happen ?

As per Science :

The Sun is a G-type main-sequence star (G2V) based on its spectral class, and is informally referred to as a yellow dwarf. It formed approximately 4.6 billion[1][2] years ago from the gravitational collapse of matter within a region of a large molecular cloud. The Sun has not changed dramatically for more than four billion years, and will remain fairly stable for more than another five billion years

Therefore Life of Sun = 9 billion years .

As per Vedas[3] :

Satya Yuga = 4 charaṇas (1,728,000 solar years) 
Treta Yuga = 3 charaṇas (1,296,000 solar years) 
Dvapara Yuga = 2 charaṇas (864,000 solar years) 
Kali Yuga = 1 charaṇas (432,000 solar years) 

Mahā-Yuga = Total of Four Yugas = 10 charanas (4,320,000 solar years) =  (4.32 million solar years) 

1000 Mahā-Yuga = A day of Brahma = 4.32 million x 1000 = 4.32 Billion years 

Day and Night of Brahma= 4.32 x 2 billion years = 8.64 Billion years  = 9 Billion years 

Thus holocaust will happen at the end of the  life of sun, as above. 

What science has calculated today, has already been done thousand years back by our Indian / Hindu Rishis in Vedas. 

 

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Why people are so spiritual  in India ?
 
India is a unique country which has  six seasons in year. 
 
No. Ritu Season Hindu lunar months Gregorian month Temperature in Northern India ( in degrees Celsius)
1 Vasanta वसन्त Spring Chaitra and Vaishakha March & April 20-35
2 Grishma
ग्रीष्म
Summer Jyeshta and Aashaadha ~ May & June 30-45
3 Varsha
वर्षा
Monsoon Shraavana(Sawan) and Bhadrapada(Bhado) ~ July & August Monsoon rains ( 20-40) 
4 Sharada

शरद्

Autumn Ashwin (Kwar) and Kartika ~ September & October 35-20
5 Hemanta

हेमन्त

Pre-winter Margashirsha(Agrahayana, Agahan) and Pausha (Poos, Foos) ~ November & December 25-10
6 Shishira
शिशिर
Winter Maagha and Phagun ~ January & February 25-5

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India ia primarily a agriculture based rural society , where around 70 % of people live in rural villages. Except Summer and Winter , remaining seasons of 8 month the weather is very pleasant and good for living . Whole year the day is goo enough to be spend outside house or in open . Further, these 8 months of time in year Indian generally sleep out side the house or on terraces which are exposed to open sky, because the nights are very pleasant . While lying on “khat (COT) ” / ground  before sleep , he sees the sky full of stars and moon . This couple of hours of gazing the starts and their movements , the natural thoughts and questions about the universe comes into his mind . This makes him believe,  that there exists a creator of the the universe and this earth and me ! And those questions, in his sub conscious mind, makes him more spiritual ! 

 

Now see the temperature data of developed countries :

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In developed countries the weather situation is reverse |  There is no season in the whole year when you can sleep outside the house or on terrace . Only 4 months is good or suitable time to be spent outside the house in a open environment in day time. The remaining  8 months of time in a year is not suitable for sleeping outside or on terrace as the temperature during these  8 months is less than 20 degrees celsius which goes upto  minus 20 degrees . Due to this cold weather he sleeps inside the house in a closed environment during these 8 months. So he thinks more about making the life comfortable and spend times in research to achieve that . This makes him more materialistic and less spritual !

 

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सात सुख : The seven bliss ! 

पहला सुख – निरोगी काया, दूजा सुख – हो घर में हो माया,
तीजा सुख – सुलक्षणा नारी, चौथा सुख – हो पुत्र आज्ञाकारी,
पाँचवां सुख – सुन्दर वास, छठा सुख – हो अच्छा पास,
साँतवां सुख – मित्र घनेरे, और नहीं जगत में दुःख बहुतेरे! 

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बेटा न हो तो एक दुःख, बेटा हो और मर जाए तो सौ दुःख, बेटा हो और नालायक निकले तो दुखों का कोई पार नहीं |

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| सिग्नल, रफ़्तार और ट्रैफिक पुलिस |

पहले हम सड़क बनाते हैं फिर ट्रैफिक बढ़ने पर गोल चक्कर ( सर्कल ) बनाते हैं | और अधिक ट्रैफिक बढ़ने पर ट्रैफिक पुलिस से ट्रैफिक कंट्रोल कराते हैं फिर ट्रैफिक पुलिस कम पड़ जाते हैं तो हम पुलिस हटा कर आटोमेटिक सिग्नल लगाते हैं | अब च्यूंकि आटोमेटिक सिग्नल के टाइमिंग २४ धंटे बदलते ट्रैफिक से मैच नहीं करते तो बदलते ट्रैफिक के अनुसार आटोमेटिक सिग्नल टाइमिंग एडजस्टमेंट / कंट्रोलर लगाते हैं | फिर भी ट्रैफिक जाम होने लगता हैं तो उस चौराहे पर सिग्नल कंटोलर को ट्रैफिक पुलिस द्वारा मैन्युअली कंट्रोल कराते हैं और जब उससे भी काम नहीं चलता तो सिग्नल ऑफ करके फिर से वही ट्रैफिक पुलिस लगाते हैं | आखिर हम ट्रैफिक को इतना बढ़ने ही क्यों देते हैं की उसको कंट्रोल करने की जरुरत हो ? और अगर ट्रैफिक को बढ़ने से नहीं रोक सकते तो बढ़ते ट्रैफिक से ध्यान में रखते हुआ उसके अनुसार इंफ्रास्ट्रक्चर समय पर क्यों नहीं बनाते ? पहले हम सड़क बनाते हैं | फिर तेज़ रफ़्तार वाली गाडी बनाते हैं | फिर तेज़ रफ़्तार को कम रखने के लिए क़ानून बनाते हैं | उससे कान नहीं चलता तो स्पीड लिमिट के साइन बोर्ड लगाते हैं | फिर भी लोग नहीं मानते तो ट्रैफिक हवलदार लगते हैं | उसकी भी जब नहीं मानते तो स्पीड डिटेक्टर लगा कर ड्राइवर को बताते हैं | उससे भी काम नहीं चलता तो फाइन लगाते हैं | उससे भी काम नहीं चलता तो लाइसेंस कैंसिल करते हैं | आखिर हम इतनी तेज़ स्पीड से चलने वाली गाडी ही क्यों बनाते हैं जिस स्पीड के लायक हमारी सड़क ही नहीं बनी ?

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योग के भेद (प्रकार)

१. राज योग अर्थात ध्यान योग 

पतंजलि योग दर्शन का मुख्य विषय राज योग अर्थात ध्यान योग है | पर अन्य सब प्रकार के योग इसके अंतर्गत हैं |

२. ज्ञान योग अर्थात सांख्य योग 

सारे ज्ञेय तत्त्व का ज्ञान इस योग दर्शन में अति उत्तमता से कराया गया है |

३. कर्मयोग 

अर्थात अनासक्ति निष्काम कर्मयोग 

४. भक्ति योग 

यह श्रद्धा , भक्ति का मुख्य अंग है , जप और मंत्र भी इसमें सम्मिलित है |

५. हठ योग 

हठ योग का सम्बन्ध शरीर और प्राण से है, जो योग के आठ अंगों – यम , नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि में से आसान और प्राणायाम के अंदर आ जाते हैं |

हठ योग , राज योग का साधन मात्र ही है |

‘ह’ का अर्थ सूर्य ( पिङ्गला नाड़ी अथवा प्राणवायु ) और ‘ठ’ का अर्थ चन्द्रमा ( इड़ा नाड़ी अथवा अपानवायु ) है , इनके योग को हठ योग कहते है |

६. लययोग और कुण्डलिनी योग 

तो राज योग ही है |

७. मनोयोग 

दृष्टि बंध ( Sightism ) , अंतरावेश ( Spiritualism ) , सम्मोहन ( Mesmerism ) और वशीकरण ( Hipnotism ) जो मनोयोग से पुकारे जाते है वे भी प्रत्याहार और धारणा के अंतर्गत है |

८. यम और नियम 

न केवल व्यक्तिगत रूप से विशेषतया योगियों के लिए बल्कि सामान्यरूप से सब वर्णो , आश्रमों , मत – मतान्तरों , जातियों , देशों और समस्त मनुष्य – समाज के लिए माननीय मुख्य कर्त्तव्य तथा परम धर्म है |

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आँखों पे चश्मा , इतना जल्दी क्यों ?


आँखों के लिए  Retinal ( रेटिनॉल ) बहुत  ज़रूरी है | Retinal जो है Vitamin A का ही एक प्रकार है | विटामिन b12 की तरह Retinal  भी सिर्फ animal  food जैसे घी / मक्खन में ही प्रचुर मात्रा में पाया जाता है | हरी पत्तेदार सब्जियां और गाजर / टमाटर / शक्करकंद / आम / कद्दू आदि सब्जियों जो विटामिन A होता है वह Retinal नहीं बल्कि beta -carotene होता है जो Retinal का function नहीं करता है |  पुराने  लोगों के खाने में  घी और मक्खन प्रचुर मात्रा में और नियमित होता था , वे खूब घी / मक्खन खाते थे | आजकल यही दोनों  चीजे Vegeterians लोग  सबसे कम मात्रा में खाते हैं | तो फिर चश्मा जल्दी लगना ही है | और जो गाय के घी में जो पीला रंग होता हैं इसका मतलब हैं की उसमे Retinal अधिक हैं | भैंस के घी में ये कम होता हैं |

Non -Veg लोग तो माँस / मच्छी खा कर retinaal की कमी पूरी कर लेते हैं लेकिन बेचारे vegeterians घी / मक्खन की कमी पूरी नहीं कर पाते और आँखे कमज़ोर कर लेते हैं |

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 मूँझ की खाट 

मूँझ की खाट जब आप सीधे लेटते हैं तो मुठ्ठी को सर के नीचे रख कर तकिया बनाना पड़ता है , जिससे आपका चेस्ट / छाती एक्सपैंड होता है और पेट अंदर जाता है | छाती चौड़ी रहने से breathing capacity / स्वास क्षमता बढ़ती है और पेट अंदर जाने से digestion capacity / पाचन क्षमता बढ़ती है | खाट के झोल से आमाशय ऊपर और आंतें नीचे के लेवल पर रहती है जो भोजन को मूवमेंट में आसानी रहती है, जिससे ब्लड को एनर्जी काम खर्च होती है | मुठ्ठी के तकिये बनाने से shoulder / कंधे के muscles की automatic स्ट्रेचिंग हो जाती है और थकान दूर होती है | तकिया लगा कर सोने से इसका उलटा होता है |

करवट ले कर लेटने के लिए आपको कोहनी मोड़ कर हाथ का तकिया बनाना पड़ता है | जिससे internal oblique / transverse oblique आदि abdominal muscles stretch होती है जो आँतों में खाने को पचाने में बहुत मदद करती हैं | कोहनी मोड़ कर हाथ का तकिया बनाने से biceps और triceps / हाथ की muscles की बड़ी अच्छी natural मालिश हो जाती है | गद्दे पर सोने से ये सब नहीं होता है |

उलटा लेटने पर , ख़ास कर जब एक टांग का घुटना ( मुड़ा हुआ ) खाट के साइड वाले डंडे पर टिका हो, उस अवस्था में खाने को बड़ी आंत में पाचन में बहुत मदद मिलती है और यदि बायां ( left ) घुटना डंडे पर हो तो , खाने को बड़ी आंत से गुदा तक जाने में बड़ी आसानी होती है जिससे शौच के बाद बड़ी आंत पूरी तरह साफ़ हो जाती है , क्योंकि डंडे का लेवल मूँझ पर पड़े पेट से ऊपर होता है | यही राज़ है , शौच के बाद ताज़गी और स्फूर्ति का | गड्ढे पर ये सब प्रक्रिया नहीं हो पाती | जमीन पर सोने से कुछ हद तक हो जाती है परंतु खाट का कोई मुकाबला नहीं है |

इस प्रकार मूँझ की खाट पर सोने से खाना जल्दी पचता है और उसके लिए कम से कम एनर्जी खर्च होती है | जिससे आप की नींद की आवश्यकता कम होती है , आप सुबह जल्दी उठते हो , रात भर थके हुए शरीर की प्राकृतिक और धीमी धीमी मालिश होने से सुबह वापस तारो ताज़ा हो जाते हो |

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चम्मच 

परंतु कुछ चम्मच ऐसे होते है जिनमे पीछे एक groove / नाली / गड्ढे नुमा जगह होती है , जिसमे आसनी से मिट्टी / गन्दगी जमा हो सकती है और फिर उसे साधार तरीके से कितना भी साफ़ कर लो या धो लो वो मिट्टी नहीं निकलती है | इसलिए चम्मच के पीछे की ओर देखो , यदि वो सपाट है plain है , जिसमे मिट्टी के जमने का कोई चांस न हो तो वो चम्मच बढ़िया है | एक और बात चम्मच जितना पतला / thin होता है उतना ही खाने में कनविनिएंट होता है | मोटे चम्मच से खाने में अड़चन होती है |

 

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जूता 

एक राजा को अपने पाँव धूल में गंदे होना पसंद नहीं था तो उसने आदेश दिया कि इसका उपाय खोजो | किसी ने कपडे कि थैली राजा के पाँव में पहना दी वही जूते का पहला रूप था | फिर धीरे धीरे वो design modify होता गया और आज हम air conditioned dust free कमरे में भी जूते पहनना पसंद करते है |

क्या ईश्वर ने आपके पंजे FLAT / समतल बनाये है ? तो फिर हम वो जूते क्यों पहनते है जो नीचे से पूरे flat हों ? जूते का आविष्कार सिर्फ इसलिए हुआ था ताकि पाँव गंदे न हों या मैले न हों | इसलिए नहीं की हम ईश्वर द्वारा बनाये गए extremely flexible panje को मूर्खता पूर्ण हरकत समझ कर उसकी रचना को challenge करें और उसके लिए सबसे flat और सबसे HARD sole वाला जूता पहनें | जूता आपके लिए वही सही है जिसका sole soft हो और वो पंजे के curves के अनुसार flexible हो | जैसे canvas या कपडे के जूते | Hard Sole वाला जूता इसलिए बना क्योंकि पहले सड़के नहीं होती थी और रास्तों में कांटे / कंकर / पत्थर बहुत होते थे , तो हार्ड सोल आपके पैरों की इनसे रक्षा करते थे | जूते जल्दी न फटे इसके लिए कपडेकी जगह leather / चमड़े का इस्तेमाल होने लगा |

जूते में जितनी ज्यादा heel होगी उतना ज़्यादा ज़ोर / pressure आपके घुटनों पर आएगा | बिना हील के जूते आपकी बॉडी की centre of gravity को ऐड़ी / heel के centre पर केंद्रित रखता है और आपके घुटनों पर सबसे कम pressure डालता है जिससे आप कम एनर्जी खर्च करके ज्यादा देर तक पैदल चल सकते है | इससे आपका posture भी improve होता है | इसलिए हील रहित जूता बेहतर होताहै |

प्रकृति ने पैर के अंगूठे को थोड़ा ऊपर के तरफ बेंड करके रखा है और चलते या दौड़ते वक्त ये बेन्डिंग बड़ी सहायक होती है , इसलिए जूता वही सही है जिसमें अंगूठे का ऊपर कि और मूवमेंट freely हो , बिलकुल भी बाधित न हो | ईसिस प्रकार पंजा और सभी उँगलियों भी फ्री रहनी चाहिए ताकि आवश्यकता अनुसार उनके मूवमेंट के लिए पूरी जगह हो |

 

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प्रकृति और कृत्तिम

ईश्वर की किसी भी रचना में , चाहे वो प्रकृति हो या जीव जंतु हो , आपको कहीं भी straight line , sharp edges या perfectly leveled planes नहीं मिलेंगे, परंतु मनुष्य की सभी कृत्तिम रचनाओं जैसे मकान, बिल्डिंग, इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स, सड़कें , मार्बल फ़्लोरिंग्स , खिड़की , दरवाज़े, कपड़ा, जूते का सोल, प्लास्टिक आदि आदि , में मुख्यतः straight line , sharp edges या perfectly leveled planes ही मिलेंगे | और वही रचना सबसे अधिक कीमती होती है जिसमे ये सबसे कम होता / होती है |

ईश्वर ने शरीर का कोई भी अंग या हिस्सा ऐसा नहीं बनाया है जिसमे straight line , sharp edges या perfectly leveled प्लान्स हों | परंतु हम अपने उपयोग के सभी चीज़ें शरीर की प्राकृतिक रचना के अनुसार नहीं बनाएंगे | और जो बनाएंगे तो वो इतनी महँगी होगी की सिर्फ उसे रईस ही खरीद पाएंगे |

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सड़क पर पैदल चलना

यदि आप किसी ऐसी सड़क या गली में चल रहें है जहाँ dedicated pedestrian foot path नहीं है, तो आपको बायें ( left ) नहीं बल्की दायें ( right ) साइड में चलना चाहिए , वो आपके लिए ज्यादा सुरक्षित और है क्योंकि आप अपनी साइड चलने वाली गाड़ियों को देख कर अपनी पोजीशन सुरक्षित रख सख्ते है | बायें चलने पर पीछे से कौन सी गाड़ी कैसे आ रही है , ये आपको पता नहीं चलता और आप insecure / असुरक्षित महसूस करते है |

हाँ यदि dedicated foot path है तब आप बायें या दायें कहीं भी चलें सब सेफ है |

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आप कितने स्वस्थ है ?

जो व्यक्ति जमीन पर पद्मासन में बिना किसी सहायता / सपोर्ट के जितनी ज़्यादा देर तक स्थिर  बैठ सकता है वह उतना ही स्वस्थ है |
जो सुखासन में ( अर्थात जिस आसन में उसे बैठने में सबसे ज़्यादा आसानी हो चाहे वो आलती-पालती हो , वज्रासन, उकड़ू हो या कोई भी प्रकार हो ) जितनी ज्यादा देर तक स्थिर  बैठ सकता है वह उतना ही स्वस्थ है परंतु पद्मासन में बैठने वाले की अपेक्षा कम श्रेणी का है |

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भिन्डी और बैंगन की पहचान

भिन्डी वो स्वादिस्ट होती है जो कच्ची हो और कच्ची भिन्डी की पहचान है जो गहरी हरी हो, छोटी हो , जिस पर रोएं हो और और बीज छोटे हैं | पकी भिन्डी के बीज उसके छिलके पर अपनी presence show करते है |
वो बैंगन ढूंढो जो काँटेदार हो | जिसके हरे छिलके पर जितने ज्यादा काँटे होंगे वो उतना ही स्वादिस्ट होगा |

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उलटी होना

जी मिचलाए या उलटी जैसा लगे तो न घबरायें | ये indication है शरीर का कि, जो आपने खा लिया है उसको आपका पेट या तो पचा नहीं पा रहा या वो पचाने लायक / suitable नहीं और शरीर उसे बाहर करना चाहता है | कोशिश करें कि जल्दी सी जल्दी उल्टीहो जाए | अगर संभव होतो गले में उंगली डाल कर उल्टी करने का प्रयास करें | जितनी जल्दी उल्टी होगी उतनी जल्दी आराम मिलेगा | उल्टी को रोकने का प्रयास न करें | यदि उल्टी रोकेंगे तो आराम तब तक नहीं मिलेगा जब तक वो खाना गुदा द्वार सी बाहर नहीं निकल जाता |

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लोग निंदा करें तो करने दो

जानहुँ रामु कुटिल करी मोही | लोग कहउ गुरु साहिब द्रोही ||

सीता राम चरण रति मोरें | अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें ||

दूसरा आदमी हमें खराब समझे तो इसका कोई मूल्य नहीं है | भगवान दूसरे की गवाही नहीं लेते | दूसरा आदमी अच्छा कहे तो आप अच्छे हो जाओगे , ऐसा कभी नहीं होगा | अगर आप बुरे हो तो बुरे ही रहोगे | अगर आप अच्छे हो तो अच्छे ही रहोगे , भले ही पूरी दुनियां बुरी कहे | लोग निंदा करे तो मन में आनंद आना चाहिए | एक संत ने कहा है –

” मेरी निंदा से यदि किसी को संतोष होता है, तो बिना प्रयत्न के ही मेरी उन पर कृपा हो गयी ; क्योंकि कल्याण चाहने वाले पुरुष तो दूसरों के संतोष के लिए अपने कष्टपूर्वक कमाए हुए धन का भी परित्याग कर देते हैं ( मुझे तो कुछ करना ही नहीं पड़ा ) “|

हम पाप नहीं करते , किसी को दुःख नहीं देते, फिर भी हमारी निंदा होती है तो उसमें दुःख नहीं होना चाहिए , प्रत्युत प्रसन्नता होने चाहिए | भगवान की तरफ से जो होता है , सब मंगलमय ही होता है | इसलिए मन के विरुद्ध बात हो जाए तो उसमें आनंद मनाना चाहिए

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 मेथी / धनिया

मेथी, पालक, धनिया, पुदीना आदि हरी पत्तेदार सब्जियाँ स्वादिस्ट या अच्छी वो होती है जिनके पत्ते छोटे छोटे होते है |

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गेहूं की रोटी सेंकने के नियम :

सबसे बढ़िया रोटी वो होती है जिसे आपका कोरा भी खाने का मन करने लगे | रोटी की स्वादिस्ठता के लिए निम्न नियम हैं :

१. आटे में गूंथने सी पहले नमक मिलाएँ | तकरीबन एक आदमी के लिए एक चाय के चम्मच के हिसाब से |

२. आटे को इतना गूंथे की उसका आपके गूंथने वाले हाथ पर चिपकना बंद हो जाए | उसके लिए ध्यान रखें की पानी की कमी न पड़े |

३. रोटी की मोटाई इस तरह हो कि वो centre / बीच में से मोटी और outer / बाहरी साइड पतली हो, slope में uniformly | यदि ऐसा न हो पाए तो कोशिश करें की रोटी की मोटाई सभी तरफ एक सामान हो | परंतु उल्टा न करें की सेंटर में पतली और आउटर में मोटी | पुराने जमाने के चकले में आप ध्यान से देखना , उसके सेंटर में गढ्डा होता है जिसकी गहराई बाहर आते आते कम हो जाती है |

४. ऐसा इसलिए करना पड़ता है क्योंकि आग तवे के सेंटर में रहती है जिससे तवा बीच / सेंटर में ज्यादा गरम और आउटर / बाहर में अपेक्षाकृत कम गरम होता है | जिससे रोटी सेण्टर में ज्यादा गरम होती है और बाहर कम | इसको बैलेंस करने के लिए रोटी बीच में से थोड़ी मोटी बनानी चाहिए |

५. तवा पतला होने पर जल्दी से ज्यादा गरम होता है जिससे रोटी तेज़ी से सिकती है जो ठीक नहीं है | तवा जितना ज्यादा मोटा होगा उतना अच्छा, इससे रोटी धीरे धीरे सिकती है और अच्छी तरह सिकती है जिससे रोटी का स्वाद बढ़ता है |
आंच / आग भी हलकी रखनी चाहिए जिससे तवा ज्यादा गरम न हो | आग तवे के जितनी नज़दीक होगी या तेज़ होगी ये temeperature difference उतना ही अधिक होगा और रोटी uniformly नहीं सिक पायेगी | आग तवे से जितनी दूर होगी उतना ही तवे के सेंटर और आउटर के तापमान में difference minimum होगा और रोटी uniformly सिकेगी जो स्वाद में बेहतर होगी |

६. अच्छी सिकी हुई रोटी वो होती है जो अपने आप बिना किसी सहायता के अपने आप फूलती है | तवा हटा कर आग पर रोटी रखने से रोटी जल्दी से फूल तो जाती है परंतु वो अच्छी तरह सिकी हुई नहीं होती है |

रोटी यदि अच्छी तरह सिकि हो तो वि इतनी स्वादिष्ठ होती हैं की उसे कोरी भी या फिर सिर्फ नमक के साथ भी खाया जा सकता हैं |

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टमाटर

असली टमाटर वो हैं जिसको यदि गुब्बारे की तरह पंचर करो / फोड़ो तो उसका रस पिचकारी की तरह बाहर फूट पड़े | यानी जिसमे रस बहुत प्रेशर से भरा हुआ हो और छिलका एकदम पतला हो |

 

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वास्तु शास्त्र क्या है ?

वास्तुशास्त्र का बड़ा ही सीधा सा मतलब है , जो घर गर्मियों में ठंडा रहे , सर्दियों में गरम रहे | ये तब संभव है जब गर्मियों में धूप कम आये और शुद्ध हवा आती जाती रहे जबकि सर्दियों में धूप ज्यादा आये |

गर्मियों में सूर्य पूर्व की और उगता है और सर्दियों में दक्षिण-पूर्व की ओर | इसी तरह गर्मियों में सूर्य पश्चिम में अस्त होता है और सर्दियों में दक्षिण पश्चिम की ओर |

यानी गर्मियों के करीब ८-१० महीनें सूर्य पूर्व / दक्षिण-पूर्व दिशा से पश्चिम / दक्षिण पश्चिम की ओर रहता है | जबकि सर्दी करीब २-३ महीने ही रहती है |

इसलिए, यदि घर के प्रवेश द्वार उत्तर पूर्व में हो तो गर्मियों में पूरे दिन धूप कम आएगी | और सर्दियों में घर के पिछवाड़े / आँगन , जो दक्षिण – पश्चिम की ओर है , में पुर दिन धूप खूब आएगी |

शुद्ध हवा आने जाने के लिए ये ज़रूरी है की खिड़की / दरवाज़े पूर्व और पश्चिम दिशा में हो , और यदि उत्तर पूर्व और दक्षिण- पश्चिम दिशा में हो तो और भी अच्छा |

बस यही वास्तु का मूल है |

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रात का खाना

रात का खाना यानी डिनर | डिनर के बाद तो सिर्फ सोना होता है इसलिए एनर्जी की आवश्यकता सबसे कम होती है | इसलिए डिनर में कार्बोहाइड्रेट्स का अनुपात कम से कम रक्खें | और फ्रूट / जूस इत्यादि तो रात को बिलकुल नहीं खाने चाहिए क्यों की इनकी आवश्यकता तो तब होती है जब हमें तुरंत बहुत ज्यादा एनर्जी चहिये | रात को नींद नहीं आने का ये भी प्रमुख कारण होता है की आपने कार्बोहायड्रेट और ग्लूकोस / फ्रुक्टोज़ ज्यादा खाया है |

रात के खाने में प्रोटीन और कैल्शियम रिच खाना बेहतर होता क्योंकि प्रोटीन / कैल्शियम रात्रि में आपके शरीर की हड्डियों और मांसपेशियों के टूट फूट को दुरस्त करता है और नयी रचना करता है | परंतु प्रोटीन कैल्शिम भी उसी अनुपात में अधिक ले जिस अनुपात में आप ने दिन भर शारीरिक श्रम किया है | यदि आप प्रोटीन शारीरिक श्रम की अपेक्षा अधिक मात्रा में लेंगे तो चर्बी बढ़ेगी |

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पौष बड़ा

पौष विक्रम संवत का दसवाँ महीना या हिन्दू पंचांग के अनुसार साल के दसवें महीने को पौष का महीना कहा जाता है। इस मास में हेमंत ऋतु होने से ठंड अधिक होती है। भारतीय पंचांग पद्धति में प्रतिवर्ष सौर पौष मास को खर मास कहते हैं। इसे मल मास या काला महीना भी कहा जाता है। इस महीने का आरंभ 16 दिसम्बर से होता है और ठीक मकर संक्रांति को खर मास की समाप्ति होती है। खर मास के दौरान हिन्दू जगत में कोई भी धार्मिक कृत्य और शुभमांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।

परंतु इस महीने में “पौष बड़ा” उत्सव मनाया जाता है | जिसमे मुख्य बात है की खाने में तेल में ताली हुई पूड़ी और मूंग की दाल की पकोड़ी खायी जाती है | वो इसलिए की सर्दी में टाला हुआ तेल / घी युक्त ( यानी फैट युक्त ) खान खून कहना चाहिए | क्योंकि अत्यधिक सर्दी में फैट , शरीर को गर्मी प्रदान करता है, ठण्ड नहीं लगती और सर्दी में ऊर्जा / स्फूर्ति बनी रहती है | इसी प्रकार मूंगफली भी बहुत फायदेमंद होती है |

और मकर  संक्रांति पर तिल के लड्डू ( तिल और गुड़ से बने ) भी इसीलिए खाये जाते है, क्योंकि तिल फैट और आयरन से भरपूर होता है | फैट गर्मी देता है और आयरन खून बनाता है | गुड़ ऐड होने से नया खून बनने की क्षमता बहुत बढ़ जाती है | 

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योग बोध और प्रेम

लोगों को समझाना जितना मुश्किल है उससे कहीं अधिक मुश्किल है लोगो को समझना ! जब आप किसी को समझ लेते है तो समझाने की आवश्यकता नहीं रहती | जिसे इस गूढ़ रहस्य का बोध हो जाता है वो प्रभु से अपने रिश्ते ( योग ) को मान लेता है फिर वह ईश्वर एवं ईश्वर के नाते सभी प्राणियों से प्रेम करने लगता है |

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कैल्शियम और विटामिन डी
 
कितना भी कैल्शियम खा लो सब बेकार है जब तक की आप विटामिन डी नहीं लेते है | विटामिन डी ही कैल्शियम को शरीर में अब्सॉर्ब करने करने की क्षमता रखता है | और विटामिन डी सिर्फ सूर्य की डायरेक्ट किरणों ( सनलाइट ) यानी धूप से मिलता है | जितना आप धूप में रहेंगे उतना  ज्यादा कैल्शियम आपके शरीर में अब्सॉर्ब होगा | 
 
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 कितना खायें ?

अधिकतर बीमारियां कम खाने से नहीं, बल्की ज्यादा खाने के कारण होती है | ज्यादा खाने कि ये मुख्य निशानियां है : १. सवेरे एक बार में शौच पूरा न होना यानी २/३ बार जाने के बाद अच्छा महसूस करना ;
२. सवेरे के अलावा दिन में / शाम को या सोने से पहले भी शौच जाना ; २. खाने के बाद नींद या झपकी आना ; ३. दिन भर आलस्य महसूस करना ; ४. दिन भर ऊर्जावान / स्फूर्तिवान महसूस न करना ; ५. सवेरे देर से उठना या ८ घंटे से अधिक सोना |

प्राकृतिक नियम तो ये है कि भर पेट न खायें | जितना खा सकते है उससे करीब २० % कम खायें | उदाहरण के लिए यदि आप नियमित २-३ रोटी खाते है तो आधी रोटी काम खायें | पानी या तो खाने से कुछ देर पहले पी लें परन्तु खाने के दौरान न पियें | और खाने के बाद कम से कम आधा घंटे तक पानी न पिए |

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गायत्री मंत्र 

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् |

(ॐ/ओं) यह प्रभु का मुख्य नाम है | वह (भू:) प्राणों का प्राण (भुवः) दुःखनाशक (स्वः) सुखस्वरूप है |

(तत्) उस (सवितुः) सकल जगत के उत्पादक (देवस्य) प्रभु के (वरेण्यं) ग्रहण करने योग्य (भर्गः) विशुद्ध तेज को हम (धीमहि) धारण करें |

(यः) जो प्रभु (नः) हमारी (धियः) बुद्धियों को (प्रचोदयात्) सन्मार्ग में प्रेरित करे |

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किसे महत्व दें ? 

जीवन में कई क्षण ऐसे होते है जब ये समझ नहीं आता की हम किसे ज्यादा महत्व दे या निर्णय किस आधार पर लें |
मानवता के सिद्धान्त अनुसार, सिक्के से वस्तु, वस्तु से व्यक्ति, व्यक्ति से विवेक तथा विवेक से सत्य को अधिक महत्व देना चाहिए ! 
 

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 योग क्या है ?

योग एक दैवी वैधानिक शक्ति है। जीवन के प्रत्येक पहलू में योग अपेक्षित है। शरीर-विज्ञान, मनोविज्ञान, आध्यात्म-विज्ञान एवं आस्तिक-विज्ञान योग में निहित हैं। देहाभिमानी साधकों के लिए योग का बाह्य रूप जो शारीरिक हित के लिए है, अत्यन्त आवश्यक है; आर्थात् उत्कृष्ट भोग की प्राप्ति भी योग से ही साध्य है। और देहातीत जीवन के लिए तो योग परम आवश्यक है।

शारीरिक क्रियाकलाप मात्र में ही योग को आबद्ध कर लेना योग की वास्तविकता से विमुख होना है। व्यक्तित्व को सुन्दर बनाना और उसके (व्यक्तित्व के) अभिमान से रहित होने के लिए भी योग अपेक्षित है। इतना ही नहीं, प्राकृतिक विधान के अनुसार सब प्रकार की शक्तियों का उद्गम भी योग है। बल, ज्ञान और प्रेम की प्राप्ति में भी योग ही हेतु है। परमात्मा से आत्मीय सम्बन्ध योग है। तत्वज्ञों का जातीय-सम्बन्ध योग है। योगियों का नित्य-सम्बन्ध योग है। अर्थात् शक्ति, मुक्ति, भक्ति, सभी के लिए योग अपेक्षित है।

अधिकतर लोग शरीर-विज्ञान और मनोविज्ञान की सीमा में ही योग को आबद्ध कर लेते हैं, जबकि योग का क्षेत्र कहीं अधिक विस्तृत है। राग की पूर्ति और निवृत्ति दोनों में ही योग हेतु है।

मानव-दर्शन पर आधारित मानव सेवा संघ की प्रणाली के अनुसार परिश्रम तथा पराश्रय से रहित होने पर सहज-भाव से नित्य योग की उपलब्धि होती है। नित्य योग में ही योग के समस्त अंगो का समावेश है। पर इस वास्तविकता को कोई बिरले ही अपना पाते हैं। शरीर और विश्व की सेवा में श्रम का स्थान है, किन्तु देहातीत, अविनाशी जीवन और अनन्त, नित्य, चिन्मय, रसरूप जीवन के लिए परिश्रम तथा पराश्रय का अत्यन्त अभाव अपेक्षित है।

सही प्रवृति के फलस्वरूप कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति में सहज निवृत्ति कि शान्ति अभिव्यक्त होती है | अतः साधक के लिए प्रत्येक प्रवृत्ति को राग-निवृत्ति का साधन मानकर सावधानीपूर्वक सम्पन्न करना चाहिये | राग-निवृत्ति कि शान्ति में ही योग, बोध व प्रेम की अभिव्यक्ति होती है, और इसी में जीवन की पूर्णता है |

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पान सुपारी

बहुत ही उम्दा चीज़ है ये , सर्दी और बारिश के मौसम के लिए । सुपारी शरीर को गर्मी देती है, चूना केल्शियम की कमी नहीं होने देता और कत्था पोटेशियम की भरपायी करता है । चूंकि ये तीनो चीजे tasteless होती है इन्हें अलग अलग कोरा खाना संभव नहीं है इसीलिए  पान का पत्ता इन तीनों को स्वादिस्ट बना देता है । पहाड़ी इलाकों में जहां बारिश ज़्यादा होती है ठण्ड भी पड़ती है वहां साल में ज़्यादातर समय  पान इसीलिए खाया जाता है। गर्म इलाकों में इसीलिए इसकी आवश्यकता कम होती है इसलिए लोग इसे ज्यादा नहीं खाते ।

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प्लास्टिक 

कई बार आपने देखा होगा की जब  प्लास्टिक का मग्गा पानी से भरी हुई बाल्टी में कुछ दिनों की लिए डूबा हुआ रह जाता है तो कितना  चिकना हो जाता है । वो चिकनाहट बड़ी अजीब से होती है और आसानी से या जल्दी से ख़त्म नहीं होती । अब सोचिये महीनों तक पानी से भरी प्लास्टिक बोतल का पानी हम कितने प्यार से पीते है । प्लास्टिक कितनी आसानी से तेज़ लौ में पिघल जाता है । इसी तरह  गर्म गर्म खाने को जब हम polythene या प्लास्टिक की प्लेट या थर्मोकोल की प्लेट   में डालेंगे तो क्या प्लास्टिक का कुछ अंश गर्मी की वजह से उस खाने में मिल जाता है । वो ज़हरीला होता है ।और जो प्लास्टिक की पानी या कोल्ड्रिंक की बोतलें घंटो धुप में पड़ी रहती है तो निश्चित रूप से प्लास्टिक पानी से केमिकल रिएक्शन करता है । वो बहुत हानिकारक है ।

कैंसर के कारणों में एक मुख्य कारण प्लास्टिक का अधिक उपयोग ही बताया गया है । परन्तु देखिये विकास और आधुनिकता का फैशन की हम तोड़ी की convienience की खातिर ज़हर भी आँख मीच कर गर्व से खा रहे है ।

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मेहमान

भारत में मेहमान ईश्वर का रूप माना जाता है । इस तरह ग्राहक भी ईश्वर समान ही होता है । पुरानी दुकानों में ग्राहक के लिये बैठने और पानी पीने का विशेष इंतज़ाम होता था । जिससे  ग्राहक आराम से और शान्ति से सामान खरीदता था । इस विकास का और पश्चिम सभ्यता को देखो बड़े बड़े एयर  कंडीशंड माल और शोरूम तो बना दिए परंतु पूरे माल में बैठने के लिए एक कुर्सी या स्टूल तक नहीं मिलेगा । और तो और सेल्स पर्सन्स को भी बैठने के लिए कुछ नहीं है । पुरे 8/ 10 घंटे उन्हें भी खड़े रहना पड़ता है । सिर्फ मालिक अपने लिए एक्सक्लूसिव  टेबल कुर्सी लगा कर बैठता है । इसी को modernisation और developement कहते है ?

सर्दियों में अक्सर देखने में आता है कि माल का air-conditioning   बंद रहता है । परंतु इससे माल के अंदर जो लोग रहते है उन्हें इस बात का अहसास नहीं रहता की वो extreme suffocation में है वहाँ fresh air नहीं आने से oxyzen level alarmingly low हो जाता है । ये भी एक मुख्य कारण है जल्दी थकान महसूस होने का और घर लौट कर पिंडलियों में दर्द महसूस होने का । वैसे पिंडलियों में दर्द का एक कारण और है वो ये की मॉल का फर्श अत्यधिक चिकना और समतल  होता है जिसे पिंडलियों और घुटनो पर बहुत ज्यादा जोर पड़ता है ।

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“रोग” का मूलभूत कारण

शरीर में जमे हुए गन्दे तत्व (फुजला) को बाहर निकालने की कुदरती कोशिश को “रोग” कहते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा इस गन्दगी को बाहर निकालने में सहायता पहुँचाती है। फ्रेंच वैज्ञानिक बुचार्ड ने कहा है – शरीर विष निर्माण का एक कारखाना है | ये विष हमारे शरीर से लगातार बाहर निकलते रहना चाहिए और शरीर से विष बाहर निकालने के चार रास्ते हैं – १. सांस , २. पसीना , ३. मूत्र औए ४. मल | विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कुछ ही मिनट साँस द्वारा , २४ घंटे तक त्वचा द्वारा , ७२ घंटे तक गुर्दों द्वारा एंड १५ दिनों तक अंतड़ियों द्वारा मल शरीर से बाहर न निकले तो मनुष्य का जीना मुश्किल हो जाता है | सब प्रकार के रोगों का मूल कारण एक सामान है , वह कि शरीर में या उसके किसी संस्थान में व्यर्थ पदार्थ जमा ( फुजला) जमा होना , जो श्वास -त्वचा-मल-मूत्र आदि द्वारा शरीर के बाहर नहीं निकाला जा सका और शरीर के ही किसी कोने में उसकी तह पर तह जमता गया है, जिसका कारण खान पान या जीवन निर्वाह ( लाइफ स्टाइल) की गलत आदतें | जब तक शरीर-यन्त्र और उसके पुर्जे प्रबल रहते हैं , तब तक वे इस विकार को लगातार साँस – पसीने – मल -मूत्र आदि द्वारा बाहर धकेलते रहते हैं | परन्तु ज्यों ही शरीर यन्त्र में गंदा माद्दा तेजी से और इतनी अधिक मात्रा में जमा होने लगता है कि शरीर के अंगो में उतनी शक्ति नहीं रहती कि उस विकार को बाहर निकाल सके तो वह शरीर के अंदर ही जमा होने लगता है जो कि रोग का मूलभूत कारण होता है |

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Why is local food grain good ?

100 gms of Bajra (Millet), gives 8 mg ( 45 % of Daily Value Requirement (D.V.)) of Iron as compared to Wheat Flour (Aatta) which gives only 4.9 mg (25 % of  D.V.). The Refined Wheat Flour (Maida)  gives only  2.7 mg ( 15 % of D.V.). That appears to be one of the reason why Bajra is commonly used  in Western Rajasthan (Desert), throughout the year. Instead of Bajra,the rural areas, use Bajri which is much smaller in size than Bajra. Bajra may not be suitable in summers as its is gives more heat o body, but that is not the case with Bajri which is consumed in summer also .

 50 gms of Poha (Rice Flakes),  gives 100 % of D.V. of Iron. That why it is commonly used in M.P. The Puffed Rice (Murmura) of 50 gms also gives  55 % of D.V. of Iron.

Ragi (Nachni), which is very popular and commonly used in Maharashtra, is excellent source of Calcium. 50 gms of Ragi gives 100% of  D.V. of Calcium.

 Ragi ( and of course Rice also ) has maximum carbs to protein ratio, to deliver high energy,  quickly.

 

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हिन्दू क्या है, सनातन क्या है और धर्म क्या है ?

एक हजार वर्ष पूर्व हिंदू शब्द का प्रचलन नहीं था। ऋग्वेद में कई बार सप्त सिंधु का उल्लेख मिलता है। सिंधु शब्द का अर्थ नदी या जलराशि होता है इसी आधार पर एक नदी का नाम सिंधु नदी रखा गया, जो लद्दाख और पाक से बहती है। ईरानी अर्थात पारस्य देश के पारसियों की धर्म पुस्तक ‘अवेस्ता’ में ‘हिन्दू’ और ‘आर्य’ शब्द का उल्लेख मिलता है।

भाषाविदों का मानना है कि हिंद-आर्य भाषाओं की ‘स’ ध्वनि ईरानी भाषाओं की ‘ह’ ध्वनि में बदल जाती है। आज भी भारत के कई इलाकों में ‘स’ को ‘ह’ उच्चारित किया जाता है। इसलिए सप्त सिंधु अवेस्तन भाषा (पारसियों की भाषा) में जाकर हप्त हिंदू में परिवर्तित हो गया। इसी कारण ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिंदू नाम दिया। किंतु पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोगों को आज भी सिंधू या सिंधी कहा जाता है।

दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मानना है कि चीनी यात्री हुएनसांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति ‍इंदु से हुई थी। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है। भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है। अत: चीन के लोग भारतीयों को ‘इन्तु’ या ‘हिंदू’ कहने लगे।

सनातन

सनातनमेनमहुरुताद्या स्यात पुनण्रव् ( अधर्ववेद 10/8/23)

अर्थात – सनातन उसे कहते हैं जो , जो आज भी नवीकृत है । ‘सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘हमेशा बना रहने वाला’, अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त।

यीशु से पहले ईसाई मत नहीं था, मुहम्मद से पहले इस्लाम मत नहीं था। श्री कृष्ण की भागवत कथा श्री कृष्ण के जन्म से पहले नहीं थी अर्थात कृष्ण भक्ति सनातन नहीं है । श्री राम की रामायण तथा रामचरितमानस भी श्री राम जन्म से पहले नहीं थी अर्थात श्री राम भक्ति भी सनातन नहीं है । श्री लक्ष्मी भी, (यदि प्रचलित सत्य-असत्य कथाओ के अनुसार भी सोचें तो), तो समुद्र मंथन से पहले नहीं थी  अर्थात लक्ष्मी पूजन भी सनातन नहीं है । गणेश जन्म से पूर्व गणेश का कोई अस्तित्व नहीं था, तो गणपति पूजन भी सनातन नहीं है ।

केवल सनातन धर्मं ही सदा से है, सृष्टि के आरंभ से सृष्टि के अंत |

The term ‘sanaatan’ was mentioned and explained in depth in Vedic literature (Rig Veda) (4-138)

सनातन सत्य

अहं ब्रह्मास्मी और तत्वमसि। 

सत्य दो धातुओं से मिलकर बना है सत् और तत्। सत का अर्थ यह और तत का अर्थ वह। दोनों ही सत्य है। अहं ब्रह्मास्मी और तत्वमसि। अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ और तुम ही ब्रह्म हो। यह संपूर्ण जगत ब्रह्ममय है। ब्रह्म पूर्ण है। यह जगत् भी पूर्ण है। पूर्ण जगत् की उत्पत्ति पूर्ण ब्रह्म से हुई है।

।ॐ।। पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।- ईश उपनिषद

 पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण जगत् की उत्पत्ति होने पर भी ब्रह्म की पूर्णता में कोई न्यूनता नहीं आती। वह शेष रूप में भी पूर्ण ही रहता है। यही सनातन सत्य है। ब्रह्म ही सत्य है। ब्रह्म शब्द का कोई समानार्थी शब्द नहीं है।

धर्म

It means that such actions, thoughts and practices that promote physical and mental happiness in the world (abhyudaya) and ensure God realization (nishreyas) in the end, are called dharm. Its earliest record is the Rigveda, which is the record of ancient sages who by whatever means tried to learn the truth about the universe, in relations to Man’s place in relation to the cosmos. This search has no historical beginning; nor does it have a historical founder.

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मसाला / बाजरा

मसाले जितने फ्रेश पिसे हुए होंगे उतने गुणकारी होंगे | क्योंकि एक बार पिसने के बाद समय के साथ उनकी खुशबू जाती रहती है और उनकी धीरे धीरे गुणवत्ता भी कम होने लगती है |

बाजरे का आटा भी कुछ दिनों के बात कड़वा होने लगता है इसलिए वो भी जीतेने हो सके फ्रेश ही इस्तेमाल करना चाहिए |

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नाले में उगी सब्जियां 

यदि आप को डर है कि जो सब्जी आप खरीद रहें है वो कहीं नाले के आस पास उगी हुई तो नहीं है , तो उसका एक सीधा solution ये है कि आप सब्जी मॉल से खरीदें । विशेषकर पत्ते वाली सब्जियाँ जैसे पालक , मेथी, धनिया, पुदीना आदि । क्योंकि पत्तेदार सब्जियाँ ही अक्सर नालों के आस पास ज्यादा उगायी जाती है और मॉल वाले कम से कम इनसे नहीं खरीदते है ।

 

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टीवी 

टीवी खरीदते वक्त ये देखें कि sound system / speakers kiske ज्यादा अच्छे है । स्क्रीन में कोई ज्यादा फर्क नहीं होता लेकिन , अच्छी आवाज़ टीवी को थिएटर बना देती ही ।

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टायर में हवा

Taayar में हवा कितनी होनी चाहिए ? उत्तर है उतनी जितनी manufacturer ने recommend या specify की है । हवा ज्यादा भरने से गाडी का average तो बढ़ जाता है लेकिन टायर का सड़क के साथ grip कम हो जाता है जिससे तेजी से ब्रेक लगाने पर skid होने के चांस बढ़ जाते है विशेषकर हाईवे पर । और खड्डे वाली सड़कों पर शॉकर्स और सस्पेंशन पर अधिक लोड पड़ता है जिससे गाडी के wear tear बढ़ता है एवं लाइफ कम होती है । जबकि हवा कम भरने से इसका उल्टा असर होता है यानी गाडी की सेफ्टी बढ़ती है , मेंटेनेंस कम होता है और लाइफ बढ़ती है । 

जब गाडी फुल loaded  या अधिक loaded हो सिर्फ तभी specified pressure से 1 या 2 पौंड ज्यादा हवा भरना ठीक रहता है ।

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केला

केला पाउडर से पकाया हुआ है इसकी पहचान सिर्फ इतनी सी है कि केले के गुच्छे का पूरा हिस्सा गोल्डन येल्लो होगा लेकिन जो सबसे ऊपर वाला हिस्सा यानी डंडी / ठूंठ है जिसेसे केले जुड़े हुए हैं वो हरा होगा ।

Natural पके केले का छिलका पतला होता है और अधिक पकने पर उस पर छोटे छोटे  काले काले स्पॉट पड जाते है जिस वजह से उसे छतरी वाला केला भी कहते है । 

केले का छिलका जितना मिटा होगा उसका taste उतना ही कम अच्छा होगा ।

केली ,जो की south india में होती है वो  size में केले से भले ही बहुत छोटी होती है लेकिन उसके गुण यानी nutritional value बड़े केले से कम नहीं होते । 

खेलने जाने से  पहले या खेलने के दौरान / बीच में केला खायें । बहुत लाभकारी होता है क्योंकि इसमें तुरंत एनर्जी देने की क्षमता है और केला अपने आप में  एक complete food माना गया है ।

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Prayer before eating

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना ।।
 
The act of offering is God, the oblation is God, By God it is offered into the Fire of God, God is that which is to be attained by him, who performs action pertaining to God.

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Colour of Food 

 White coloured food are rich in calcium, yellow coloured in beta carotene , red in potassium and black in iron. Similarly roots are rich in carbohydrates, leafy vegetables in iron and legumes in proteins. Animal food is the only source of vitamin b12 and retinol.Animal food is equally rich in carbs, proteins and fats. Spices increases the metabolism. 

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दही

लंच में दही खाना सर्वोत्तम है | परंतु डिनर में दही वर्जित है , नहीं लेना चाहिए |

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लूंगी

साउथ इंडियन में विशेषकर केरल, तमिलनाडु के कोस्टल एरियाज में समुद्र की वजह से बहुत अधिक उमस / humidity होती है जिससे पसीना बहुत आता है इसलिए लूंगी ही सर्वोत्तम और suitable ड्रेस है | पसीना इतना ज़्यादा आता है कि पैंट, निकर, या धोती पहनना बहुत ही uncomfortable होता है | लूंगी को आप जब चाहें ऊपर करके आसानी से काम भी कर सकते है |

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दंडा , पगड़ी और लोटा

राजस्थान में , विशेषकर पश्चिमी राजस्थान में जो कि रेगिस्तान है वह गर्मियोंमें अधिकतम तापमान ४५ से ५० डिग्री सेलसियस तक चला जाता है जिससे लू लगने का ख़तरा रहता है | सर पे बंधी पगड़ी खोपडी को थोड़ा ठंडा रखती है जिसे लू नहीं लगती | इसी तरह सर्दियोंमें न्यूनतम तापमान 0 से ५ डिग्री तक हो जाता है जिसमें भी सर पर बंधी हुई पगड़ी सर को गर्म रखती है और ठण्ड लगने से बचाती है |

पुराने समय में जब पानी गैरों में नल से नहीं आता था तब पानी हमेशा कुओं से भरना पड़ता था | उस समय लंबी दूरी के यात्री अपने साथ पगड़ी , डंडा और लोटा हमेशा साथ ले कर चलते थे | वो इसलिए ताकि रास्ते में या आस पास के कुएं से पगड़ी और डंडे से लोटे को बाँध कर कुएं से पानी निकाला जा सके | डंडे का एक और उपयोग होता था एक तो जंगली जानवरों से अपनी सुरक्षा में और दूसरा चोर – डाकुओं से भी लड़में में काम आता था | उस वक्त self defense के लिए समान्यतः सभी को दंड चलाने कि ट्रेनिंग दी जाती थी और expert डंडे बाज़ ८-१० लोगों से अपनी सुरक्षा करने में सक्षम होता था |

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मोज़े

सर्दी में लंबे मोज़े पाँव को ठण्ड से बचाते है परन्तु गर्मी में छोटे / ankle तक के मोज़े पहने चाहिए वो आपके पैरों को अनावश्यक गर्मी नहीं देंगे | सूती मोज़े शहरी को ज्यादा comfortable feel देते हैं |

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देसी खाना

सबसे बढ़िया breakfast है छाछ राबड़ी । उसमे बारीक बारीक प्याज और हरी मिर्च काट कर दाल दो तो मज़ा ही कुछ और है |

सबसे बढ़िया lunch है दही रोटी , चटनी (लाल मिर्च / लहसुन / काचरे की ) और साथ में हरी मिर्च, प्याज और अचार ।

सबसे बढ़िया dinner है दूध रोटी, दाल के साथ ।

पूरे दिन भर में एक व्यक्ति करीब एक लीटर दूध से बने product जैसे दही , छाछ , घी , मक्खन आदि consume करता है । रोटी घी से चुपड़ी रखता है और जो भी सलाद / सीजनल सब्जी यदि मिल जाय तो लंच में रोटी के साथ थोड़ी सी खा लेता है । वैसे सब्जी की आवश्यकता ज़्यादा होती नहीं है यदि आपने एक लाइट दूध या उससे बानी चीज़े दिन भर में खा लेते हों तो |

उत्तर भारत का किसान और मज़दूर , विशेष कर राजस्थान में दिन भर का तीन वक्त का खान, 6 -6 घंटे के अंतराल पे , सामान्यतः यही खाता है और स्वस्थ एवं मस्त रहता है । इसी के दम पर दिन भर मेहनत करता है और चैन की नींद निकाल कर सुबह ४-५-६ बजे एकदम फ्रेश / तारो ताज़ा उठता है |

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चड्डी

दोनों जंघाओं के बीच में मूत्राशय के पास , उमस की वजह से स्किन के आपस में बार बार रगड़ खाने से यदि स्किन प्रॉब्लम हो तो उसका से उपाय try करें | पुराने जमाने में गुटनों तक लंबी दो चड्डी / घुटन्ना पहना जाता था वो पहने | ध्यान रहे वि पुरे कॉटन / खाड़ी का हो | और यही आप खेलें जाते हो या बहुत भाग दौड़ करते हों तो सूती कपडे की बनी लंगोट पहने | लंगोट पहनने में दिक्कत हो तो , घुटने के ऊपर मॉडर्न V – Shape underwear पहन लें |
इस प्रकार आपकी जाँघे और मूत्राशय की स्किन का डायरेक्ट कांटेक्ट नहीं होगा और स्किन प्रोबलम धीरे धीरे खत्म हो जायेगी |

 

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नमक 

जो प्राकृतिक है वही आपके लिए सर्वोत्तम है । इसलिए  समुद्री नमक ही आपके लिए बेस्ट है । जो टेबल साल्ट यानी फेक्ट्री में प्रोसेस / ट्रीटमेंट  किया हुआ नमक है उसमें जो नैचुरली मिक्स्ड मिनेरल्स ख़त्म हो जाते है और आर्टिफिशल कंटेंट्स मिक्स हो जाते है जो आपके लिए नुकसानदायी होते है । 

जो सैंधा नमक है वो चट्टानों से निकलता है इसलिए उसे रॉक साल्ट बोलते है । रॉक से निकलने के कारण ये मिनरल्स से भरपूर होता है । चूँकि पहाड़ी इलाकों में जो पानी होता है वो डीप ग्राउंड वाटर नहीं होता इसलिए उसमे मिनरल्स बहुत कम होते है तो प्रकृति ने उनके लिए रॉक साल्ट द्वारा उसकी कमी पूरी कर दी । परंतु जो लोग डीप ग्राउंड वाटर , कुँए और बोरिंग द्वारा निकाला हुआ पानी पीते है उसमें मिनरल्स sufficiently मिक्स्ड होते है इसलिए उन्हें रॉक साल्ट की जरुरत नहीं होती है । 

परन्तु आजकल आरो द्वारा प्रोसेस्ड  वाटर जो लोग पीते है उसमें RO द्वारा जो हानिकारक तत्त्व या मिनरल्स फिल्टर होते है उनके साथ साथ जो उपयोगी होते है वो भी फ़िल्टर हो कर निकल जाते है । उन filtered उपयोगी मिनरल्स की कमी को पूरा करने के लिए रॉक साल्ट जरुरी हो जाता है ।

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दालें

सबसे हल्का और आसानी से पचने वाला प्रोटीन है मूँग की दाल ।

व्यायाम या खेल कूद या फिजिकल लेबर करने वालों के लिए प्रोटीन के रूप में चने की दाल ज़रूरी है जो की muscular strength बढ़ाती है ।

Extra ordinary यानी अत्यधिक हार्ड वर्क करने वाला ही उड़द की दाल digest करने की क्षमता रखता है ।

सोयाबीन मानव शरीर के लिए बहुत ज्यादा suitable प्रोटीन नहीं है ।

चंवले की दाल ही सम्पूर्ण यानी कम्पलीट प्रोटीन होती है ।

दालें सिर्फ डिनर में खानी चाहिए क्योंकि इसको पचाने के लिए शरीर के ब्लड को अपनी संपूर्ण शक्ति लगानी होती है और वो कार्य नींद में अच्छे से होता है ।

दिन में दाल खाएंगे तो खाने के बाद सुस्ती और नींद या झपकी आने के चांस काफी ज्यादा है ।

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सोने के गहने 

जब आप सोने के गहने खरीदते हैं तो उसकी कीमत का 10% से 30% तक बनवाई यानी making charge देते हैं ।

वाही गहना जब आप वापस बेचते है तो सुनार सिर्फ सोने के वज़न के पैसे देता है लेकिन  making charge के पैसे नहीं देता है । इस तरह आपको 10% से 30% का नुक्सान होता है ।

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सोने से प्यार

भारत में सोना बहुत  लोकप्रिय है क्योंकि यहाँ के अधिकतर लोगों का रंग गेंहुआं है जिस पर सोने का रंग बहुत ज्यादा मैचिंग है जो सुंदरता को बहुत ज़्यादा बढ़ा देता है । white skinned यानी गोर लोगों पर सोना इतना ज्यादा नहीं फबता है जितना गेहुएं रंग पर ।

और सोना जितना pure / शुद्ध , say 22/24 कैरेट होता है गेहुएं रंग पर उतना ज्यादा सूट करता है । 

वहीँ काले लोगों पर कम शुद्ध यानी less pure , say 16 और 18 कैरट ज्यादा सूट करता है क्योंकि वो reddish / लालिमा लिए होता है जो की काली स्किन पर ज्यादा suit करता है बजाय 22/24 के ।

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बुराई

किसी को बुरा मानने का हमें अधिकार ही नहीं है , क्योंकि न तो कोई सम्पूर्ण रूप से बुरा होता है और ना ही हम किसी को सम्पूर्ण रूप से जानते हैं |

 

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सुख दुःख

आप का सुख का जन्म अन्य के दुःख से है और अन्य के सुख का जन्म आप के दुःख से है | स्वार्थी सिर्फ अपने सुख की सोचता है और परमार्थी अन्य के सुख की |

 

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गन्ने का रस

गन्ने का रस यदि ताज़ा लिया जाय तो ही फ़ायदा करता है | जितनी देर रखा जाय उतना ज़्यादा ख़राब हो जाता है और १०-१५ मिनिट के बाद पीने लायक नहीं होता है |

वैसे अन्य फलों के रस के लिए भी ये नियम लागू होता है लेकिन चूँकि अक्सर ये देखा गया है की , गन्ने वाले काफी सारा रस निकाल कर इकठ्ठा कर लेते है जैसे जैसे ग्राहक आता है उसी में से देते रहते है | कई सामान्यतया पुराने बचे हुए रस को ताज़ा रस में मिला कर देते है इसलिए सावधान रहने की आवश्यकता है |

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रैगिंग

घर में बड़ों का आदर करने का संस्कार , समाज में उठने, बैठने, बात करने की तहज़ीब और शिष्टता  माता पिता सिखाते हैं उसी तरह प्रॉफेशनल लाइफ में बड़े यानी सीनियर्स का आदर करने के संस्कार ऑफिस  में उठने, बैठने, बात करने की तहज़ीब और शिष्टता  रैगिंग द्वारा सीनियर्स सिखाते थे |  वेस्टर्न कल्चर में ऑफिस में छोटे बड़े , सीनियर जूनियर सब एक दुसरे को मिस्टर कह कर बुलाते है , क्योंकि वहॉं  बड़ों का आदर छोटे को प्यार करने जैसी संस्कृति ही नहीं है | हमने भी उनकी संस्कृति को बेहतर मानते हुए भारत में भी अब जूनियर को सीनियर का आदर करने के बजाय ये सिखाया जाता है की बड़े यदि आपके रैगिंग द्वारा संस्कार सिखए तो आप उनकी शिकायत कर सकते है | जहां पहले बड़ों को अंधकार था छोटे की गलती पर दंड देने का , अब हमने रैगिंग बंद करके चोटों को अधिकार दे दिया बड़ों को सज़ा देने का |

इसी को आधुनिकता का नाम दे दिया |

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चुगली

जो इंसान आपसे किसी तीसरे की बुराई करता है या चुगली खाता है , तो ये निश्चित है की वो जब उस तीसरे से बात करेगा तो आप की बुराई / चुगली अवश्य करेगा |
यदि आप ये मानते है जो इंसान आप के सामने आप की बढ़ाई और दूसरों की बुराई करता है तो किसी और की सामने भी यही करेगा तो ये भ्रम है |

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होली

होली का त्योंहार आप को साल में एक सर्वोत्तम अवसर देता है पुराने सभी गिले शिकवे भुलाने का और प्रेम और मस्ती के रंग में रंग जाने का | गालों को सहलाना प्रकृति जनित तरीका है प्यार के भाव को व्यक्त करने का | गुलाल से हाथों की कोमलता और बढ़ जाती है

|होली के दिन से फाल्गुन महीना शुरू होता है | सर्दी ख़त्म होने को होती है और मौसम में गर्माहट शुरू होती है , साथ में हल्की हल्की हवा चलने लगती है  और मौसम में मस्ती भरी होती है जो इंसान के अंदर दबी अल्हड़ता को उकसा जाती है |

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ककड़ी

होली के आस पास ककड़ी आनी शुरू हो जाती है | कच्ची ककड़ी इस मौसम की लिए सर्वोत्तम है इसमें पोटैशियम और आयोडिन होता है जो आपकी थकान दूर करता है और पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है | ककड़ी यदि पकी हुई हो तो उसे कच्चा नहीं कहना चाहिए , बादी करती है , उसकी मसालेदार सब्जी बना कर खाएँ |

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 मौसम और शरीर

मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग अनुकूल मौसम और वातावरण होने से काफी energetic होते है । अन्न , सब्जी, फल और दाल की पैदावार आसान और पर्याप्त होने से खाने पीने की कमी नहीं होती जिससे उनका शरीर लंबा चौड़ा होता है । जैसे पंजाबी हरियाणावी और दिल्ली के लोग।

पहाड़ी लोग जीवन की मूलभूत आवश्यकता की उपलब्धि आसान न होने से और भौगोलिक परिस्थितियाँ कठिन होने से शारीरिक रूप से बड़े मेहनती होते है परंतु पहाड़ों में विचरण करने के कारण पैरों से काफी शक्तिशाली होते है । और सीमित पैदावार और प्रतिकूल मौसम की वजह से कद में छोटे रह जाते है । जैसे north east , हिमाचली और नेपाली ।

समुद्र के किनारे coastal areas में रहने वाले लोग पुरे वर्ष उमस high humidity  में रहते है जो की मानव शरीर की लिए बहुत energetic नहीं होती । थोड़ा सा परिश्रम करते ही उमस की वजह से जल्दी थकान होती है । उमस के मौसम पैदा होने वाली मछली , नारियल और चावल पर ही निर्भर रहना पड़ता है । इनके अलावा अन्य चीज़े जो मैदानी  इलाकों में पैदा होती है वो उमस के मौसम में शरीर के लिए  suitable नहीं होती । 

उमस से low energy level environment   में लोग घर के अंदर ज्यादा comfortable महसूस करते है । इसीलिए जो indoor में रहते हुए litreture और arts को ज्यादा अपनाते हैं । जैसे मुम्बई कोंकणीं और बंगाली ।
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रोटी सब्जी बेस्ट combination

बाजरे की रोटी के साथ बैंगन की सब्जी या भरता । ये सर्दीयीं का लंच है ।

बाजरे की रोटी ( मराठी में भाखर ) के साथ कढ़ी और बड़ी मंगोड़ी की सब्जी या गट्टे या फिर पीठला (मराठी में झुणका )ये सर्दियों का डिनर है । 

बाजरे की सूखी या ठंडी या बासी रोटी छाछ में चूर कर नाश्ते में मस्त लगती है । थोड़े प्याज और हरी मिर्च के साथ ।

मक्के के रोटी के साथ कोई भी हरे पत्तेदार सब्जी जैसे पालक , सरसों, बथुआ । ये सर्दीयों के लिए है ।

बेजड़ की रोटी जो की जौ चने और गेंहू से बनती है , वो आलू प्याज की सब्जी और कढ़ी या रायते के साथ बढ़िया लगती है । ये गर्मी का खाना है क्योंकि बेजड़ ठंडक देटी है ।

गर्मी के मौसम में पूरी याने पूड़ी का मज़ा है आलू की सब्जी या कद्दू की सब्जी और खट्टे तीखे रायते के साथ ।
और सर्दीयों में पकोड़ी के साथ ।

वैसे लाल मिर्च की चटनी जिसमे लहसुन और काचरा भी पिसा हो तो किसी सब्जी की कोई जरुरत नहीं है उसे आप किसी भी रोटी के साथ खा सकते है यदि रोटी घी से बहुत अच्छी तरह चुपड़ी हो । और साथ में प्याज हरी मिर्च और छाछ हो तो फिर क्या कहने ।

मिर्च की चटनी यदि न हो तो गोन्दे, कैर या कैरी का अचार बेस्ट alternative है ।
 

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रोग 

शरीर में जमे हुए गन्दे तत्व (फुजला) को बाहर निकालने की कुदरती कोशिश को “रोग” कहते हैं।

 

सब प्रकार के रोगों का मूल कारण एक सामान है , वह कि शरीर में या उसके किसी संस्थान में व्यर्थ पदार्थ जमा ( फुजला) जमा होना , जो श्वास -त्वचा-मल-मूत्र आदि द्वारा शरीर के बाहर नहीं निकाला जा सका और शरीर के ही किसी कोने में उसकी तह पर तह जमता गया है, जिसका कारण खान पान या जीवन निर्वाह ( लाइफ स्टाइल) की गलत आदतें |

जब तक शरीर-यन्त्र और उसके पुर्जे प्रबल रहते हैं , तब तक वे इस विकार को लगातार साँस – पसीने – मल -मूत्र आदि द्वारा बाहर धकेलते रहते हैं | परन्तु ज्यों ही शरीर यन्त्र में गंदा माद्दा तेजी से और इतनी अधिक मात्रा में जमा होने लगता है कि शरीर के अंगो में उतनी शक्ति नहीं रहती कि उस विकार को बाहर निकाल सके तो वह शरीर के अंदर ही जमा होने लगता है जो कि रोग का मूलभूत कारण होता है |

 

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