जीवन का सत्य क्या है ?

1_A_स्वामीजीका परिचय (देवकीमाँ)

1_B_n_राग-रहित , भौतिक वाद की दृष्टि से योग वित्त होना, अध्यात्म वाद की दृष्टि से आत्म वित्त होना, आस्था वाद की दृष्टि से ब्रह्म वित्त हो होना ,  धर्म विज्ञान ?योग-बोध-प्रेम कर्मयोग-ज्ञानयोग-भक्तियोग की प्राप्ति !  स्थूल सूक्ष्म और कारण जगत शरीर ! भौतिक बाद : खाओ, पीओ और मौज नहीं है ! बल्कि ठीक योग विज्ञान की प्राप्ति है ! बुद्ध का निर्वाण जैन का मोक्ष और भक्त की भक्ति ! विभीषण एवं हनुमान संवाद ! प्रेम का अनंत रस, मोक्ष का अखंड रस,  धर्मात्मा का शांत रस !

2_A_n_जग की सेवा करो, अपनी खोज करो, प्रभु से प्रेम करो! सेवासे अचाह-अप्रयत्न की सामर्थ्य !पराश्रय, परिश्रम को छोड़ कर ही अपनी खोज हो सकती है ! इन्द्रियों, मन, बुद्धि, प्राणों द्वारा अपनी खोज नहीं हो सकती ! खोज करने के लिए सेवा  करनी पड़ेगी , अचाह अप्रयत्न होना पड़ेगा ! सेवा का मतलब  क्या है ?अपनी “मैं” की खोज करते करते “मैं” “है” में विलीन हो  जाता है ! मैं की खोज कैसे की जाय ?”में” को ब्रह्म कहना उपासना की एक पद्धति है !सेवा करो ताकी अचाह होने की सामर्थ्य आ जाय ,अचाह जाओ जिससे अप्रयत्न होने की सामर्थ्य आ जाए , अप्रयत्न होने से योग हो जाता है ! पतंजलि योग और मानव सेवा संघ का योग ? सेवा से अभिमान होता है ?

2_B_n_जीवन का सत क्या है ? जिसके मूल में अपने सुख का भोग रहता है वह असत कार्य और जिसके मूल में परहित रहता है वह सत्कार्य कहलाता है ! ! हरि आश्रय और विश्राम ! जो अपने कर्त्य कर्तव्य में लगा है उसके जीवन में व्यर्थ चिंतन होता नहीं ! आलसी पुरुष अकर्मण्य हो कर व्यर्थ चिंतन में आबद्ध जाता है !

3_A_n_मिली हुई वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य मेरी नहीं है, मेरे लिए नहीं है ! मेरा कुछ नहीं है- मुझे कुछ नहीं चाहिये ! सतचर्चा , सत्कार्य, सतचिन्तन करने वाला साधक  नहीं है,  जो सत्य को स्वीकार कर ले वो साधक है वर्ण प्राणी है ! जंगल में नंगे साधू और लस्सी की इच्छा ? चार जूते खाने से अपमान ?

3_B_n_ ईश्वर की आवश्यकता क्यों ? संयोग जनित सुख में वियोग का भय रहता ही है ! संयोग की दासता और वियोग का भय मिट सकता है ! डॉ. श्रीमाली उदयपुर ! साधु  – साधु की आपस की बातें ! चम्बल के किनारे ! 

4_A_+_4_B_ अगर हम शरीर को जगत की मर्जी पर और अपने को प्रभु की मर्जी पर छोड़ दे तो जीवन की जितनी समस्याएं है वे हल हो सकती है ! काम नहीं या काम नहीं करना चाहते ? संकल्प क्या है ? और जीवन की मांग क्या है ? योग्यता याने समाज के किसी भी कार्य के लिए उपयोगी होना ! बेकारी है या सही काम नहीं करते ? मानव और पशु में फर्क – दूसरों के दुःख सुख से दुखी सुखी होना !  राज योग ? शरीर पर दबाव नहीं बल्कि मन का सुधार ! योग का बाह्य रूप भौतिक विज्ञान है ! आकाश – कारण की एकता और कार्य की भिन्नता ! सेवा और त्याग से प्रेम तत्व की प्राप्ति !

5_A_+_5_B_जीवन की समस्या-मौजूद परमात्मा हमें दूर मालूम होता है और और जिस जगत से हमारा किसी भी काल में सम्बन्ध नहीं हुआ वह मिला हुआ मालूम होता है ?शरीर, संसार का अविभाज्य अंग है ? माँ – बेटे की ममता !

6_A_+6_B_योग-बोध-प्रेम ये तीन एक है, ये एक तीन है ! बुराई का मूल है सुख लोलुपता ! सुख लोलुपता याने पराधीनता सहन करना ! क्या हम अपने दृष्टि में भले हैं की नहीं, स्वाधीन हैं की नहीं , प्रेमी हैं की नहीं ?

7_A_+7_B_तीन प्रकार की लीलाएं – कुछ वन की, कुछ बृज की और कुछ निकुंज की ! न्याय और प्रेम एक साथ कैसे हो सकता है ? कथा , श्रुति, पुराण ? बृज के रस – सख्य, वात्सल्य और मधुर (परकिया) भाव !  पूतना ! बछड़े ! राधा ! गोपी ! उद्धव !

8_A_n_कोई मेरा है कोई मेरा नहीं है यही बड़ी भारी भूल है ! इस भूल से मानवता समाप्त हो गयी !अनीश्वरवाद ? बल दूसरों के लिए , ज्ञान अपने लिए और विश्वास परमात्मा से सम्बन्ध के लिए !

8_B_n_परिस्थिति प्राकृतिक न्याय है प्राप्त परिस्थिति के सदुपयोग से अविनाशी स्वाधीन जीवन  !

9_A_+9_B_जो हमारे अपने ज्ञान से  तथा आस्था से सिद्ध है वही सत्य है !भोगी कौन है और योगी कौन है ? हरी आश्रय, स्वाश्रय, धर्माश्रय (कर्त्तव्य आश्रय ) एवं विश्राम द्वारा योग की  प्राप्ति ! योग, बिना श्रम और बिना प्रयत्न के होता है ! मर्यादित भोग अथवा विचार द्वारा भोग की रूचि का नाश ! ४ आश्रम वर्ण बनाने का उद्देश्य !४ वर्ण एवं आश्रम के उद्देश्य ! 

10_A_n_अचाह हो जाये-मरने से न डरे | जीते जी मर जाय अमर हो जावे , दिल देवे सो दिलबर को पावे !  हम मिट गए तो नूरे हस्ती नज़र पड़ी, और वीरान हुए तो बस्ती नज़र पड़ी !

10_B_n_वस्तु, अवस्था, परिस्थितियों का आकर्षण ही काम है ! काम के नाश से, जिसकी (शांति, मुक्ति, भक्ति की ) स्वतंत्र स्थिति है वही हम सबको प्राप्त होता है !

11_A_n_भोगी कौन है और योगी कौन है ? हरी आश्रय, स्वाश्रय, धर्माश्रय (कर्त्तव्य आश्रय ) एवं विश्राम द्वारा योग की  प्राप्ति ! योग, बिना श्रम और बिना प्रयत्न के होता है ! मर्यादित भोग अथवा विचार द्वारा भोग की रूचि का नाश ! ४ आश्रम वर्ण बनाने का उद्देश्य !

11_B_n_स्वधर्म के तीन व्रत ! मेरा कुछ नहीं है , मुझे कुछ नहीं चाहिए और प्रभु ही केवल अपने, अभी है हैं अपने में है ! इन व्रत को अपनाने में मानव स्वतंत्र है !

12_A_+12_B_मेरी कोई मांग है या नहीं अथवा मुझ पर कोई दायित्व है या नहीं ? कोई ऐसा सुख मिलता जिसमे दुख न होता ! जब चित्त सर्वांश में शुद्ध हो जाए और सम्पूर्ण रूप से शांत हो जाए ,  उसी को योग कहते है !

13_A_संगीतमय प्रार्थना-कीर्तन-भजन !

13_B_देवकी माँ का प्रवचन !

14_A_+14_B_साधन का स्वांग या साधन निर्माण ? मूक सत्संग कैसे करें  !

15_A_+15_B_हमसे भूल ये होती है कि हम अपने सुख और दुःख का कारण दूसरों लो मान लेते है ! अर्थात व्यक्तियों, वस्तुओं , परिस्थितियों को मान लेते है !

16_A_+_16_B_इन्द्रिय जनित ज्ञान पर संदेह सर्वांश में नहीं होता ! अविवेक क्या है ?  विवेक का अनादर ! आज़ादी के बाद ?

17_A_+_17_B_मानव जीवन का मौलिक प्रश्न ? स्वाधीनता एवं अनंत रस !  अधिकार लालसा से क्रोध से विस्मृति !

18_A_+_18_B_जब साधन निर्माण अत्यंत सुगम है तो हम साधन निर्माण क्यों नहीं करते ? संकल्प  पूर्ति में उलझे रहते है !  अपने सुधार के द्वारा ही दूसरों के सुधार की आशा करें !

19_A_+_19_B_परिवर्तनशील  जगत में ऐसा मालूम होता है मानो जीवन में स्वाधीनता और सामर्थ्य की गंध ही नहीं है ?

20_A_+_20_B_हमसे सबसे बड़ी भूल ये  होती है की हम परिस्थिति को ही जीवन मान लेते है ! विकास में हेतु दुख है !

21_A_+_21_B_ कामना और कामना के नाश करने के बाद जो विरक्त बनता है वो जीवन मुक्त होता है और जीवन मुक्त  होने के बाद कोई भक्त बनता है !

22_A_+_22_B_ जो अपनी भूल होती है न वो सावधान होने मात्रा से अपने आप नाश हो जाती है !  हम जो कुछ कर रहे है उस पर ध्यान कम देते है और जो कुछ हो रहा है उस पर दृष्टि रखते है ! जाने हुए असत का त्याग करने से अकर्तव्य का नाश हो जाएगा ?

23_A_n_देवकीमाँ ! किये हुएकी आसक्ति हमें विश्राम नहीं देती !

23_B_”है” में नहीं बुद्धि-“नहीं” में है बुद्धि !

24_A_+_24_B_प्रेम की प्राप्ति में ही जीवन की पूर्णता है !  प्रेम की प्राप्ति में कोई वस्तु, अवस्था, परिस्थिति  हेतु नहीं नहीं है ! कर चोरी, ब्लैक मार्केटिंग ? दुख नाश हो भी जाय, शांति मिल भी जाए, स्वाधीनता मिल भी जाए  तो भी अहम् तो है ?

25_A_+_25_B_कोई भी ऐसे बात जो आप नहीं जानते , वो मैं बता नहीं सकता ! जिसके पास जो अनुभव है, जो आस्था है , जो क्रियाशीलता है उसी के द्वारा उसका विकास है !

26_A_+_26_B_समर्थ साधक एवं असमर्थ साधक ! साधारण  प्राणियों को भला कैसे योग की, बोध की, प्रेम की प्राप्ति  सकती है ! कर्तव्परायणता , असंगता और आत्मीयता साधन है ,  सत्संग नहीं ! सत्संग क्या है – हम वो न करे जो नहीं करना चाहिए (विवेक विरोधी) !  

27_A_+_27_B_ भक्ति ५ बातों से प्राप्त होती है ! मैं प्रभु की जाती का हूँ, उनसे मेरा नित्य सम्बन्ध है, वे अपने हैं, उनसे कुछ नहीं  चाहिए,मेरे  पास जो कुछ है उन्ही का है !

28_A_n_ मन वश में कैसे हो सकता है ?

28_B_n_मैं प्रभु का हूँ और प्रभु मेरे है – यह समझने में बड़ी कठिनाई होती है !

29_A_n_प्रभु मेरे अपने हैं, अपने में हैं, अभी हैं, समर्थ हैं, अद्वितीय हैं ! कोई और नहीं है, कोई गैर नहीं है , अपने हैं ! ऐसा विश्वास हो जाए तो हम अभी , अभी भक्त हो जाए ! 

29_B_n_आज़ादी के समय , डॉ. राजेंद्र बाबू से प्रश्न ! लीडर का अंत मिनिस्ट्री में हो जाएगा तो लीडर  कहाँ से आएगा ? सेवा का अंत अगर त्याग में नहीं हुआ तो फिर सेवा क्या हुई ? त्याग का अर्थ घर छोड़ना नहीं है !

30_A_+30_B_क्या कोई ऐसा प्राणी है जिसे रस की मांग न हो ? रस का उद्गम स्थान और स्वरुप क्या है ? रस के दाता या भोगी ? पुरुष में आधी नारी ! मिल मालिक का स्कूल दान !

31_A_n_अकर्तव्य का बीज ? संकल्पों की पूर्ती ? कर्त्तव्य विज्ञान से योग विज्ञान से तत्त्व विज्ञान (अध्यात्म ) से आस्तिक विज्ञान ! योग, बोध, प्रेम का दार्शनिक भेद एवं प्रीति की एकता !

31_B_n_सुन्दर समाज की कसौटी ? कार की आवश्यकता सभी को ? धनी निर्धन हो गया ? कर्त्तव्य विज्ञान ? 

32_A_+_32_B_प्राणी वर्तमान में निर्दोष है, अपने पर न्याय करे, क्षमा नहीं  ! किसी को बुरा न समझे, उस पर न्याय नहीं , क्षमा करे, विवेक सम्मत न होने पर असहयोग करे, क्षमा मांगे एवं प्रभु के नाते अपना माने तथा उसकी सेवा करें ! 

33_A_n_कामना पूर्ति ( डिग्री) के अंत में क्या प्राप्त है ! सत्संग से अविनाशी तत्व की , असत से नाशवान तत्व की प्राप्ति  होती है ! गुरु की आवश्यकता ? गुरु से बिछोह !

33_B_n_करना, जानना और मानना की एकता में साधन की पूर्णता, में साधन की सिद्धि है ! निज ज्ञान का प्रकाश कर्त्तव्य, असंगता और विश्वास में बट जाता है !

34_A_+_34_B_1_साधन युक्त जीवन मानव  है ! असाधन का नाश  साधन की अभिव्यक्ति कैसे हो ?

34_B_2_n_मैं कोई नयी बात नहीं बताने आया हूँ ! आपकी जानी हुई बात ही बताने आया हूँ ! सुन्दर समाज का निर्माण हो और अपना  कल्याण हो !

35_A_n_साधन के ये प्रधान अंग है – विचार , विश्वास और कर्त्तव्य !

35_B_n_जीवन में जो अकर्तव्य , पराधीनता आ गयी है , नीरसता आ गयी है वो मिट सकती है !

36_A_n_उन्होंने ज्ञान इसलिए दिया कि मानव स्वाधीन हो कर , अजर अमर हो कर सदा सदा उनको लाड लड़ाता रहे , रस देता रहे !

36_B_n_प्रभु विश्वासी जो ये मानते है कि भगवान् है और अपने हैं वे इस अजन्मा का जन्म  हैं !

37_A_+_37_B_1_सच बात तो ये है कि बताने की कोई बात ही  नहीं है ! कारण की प्रत्येक में साधन विद्यमान है ! अपने बनाये हुए साधन ने उस विद्यमान साधन को ढक दिया है !

37_B_2_n_प्रेमी होने के लिए, उदार होने के लिए और दुख निवृत्ति के लिए स्वाधीन स्वाधीन होना जरूरी है !

38_A_n_मानव सेवा संघ क्या है ? मानव जीवन का महत्व क्या है ? आप मानव  होने के नाते जीवन का क्या मूल्यांकन करते है ?

38_B_n_जो चीज़ इस जीवन में  मिल सकती है उसको प्राप्त करने पर आगे के जीवन का प्रश्न नहीं रहता !

39_A_+39+B_1_सती जी ! वैराग्य और परिवार और निकटवर्ती समाज की सेवा प्रह्लाद ! शबरी ! गोपियों का परकीया भाव ! गोपी वस्त्र हरण ! उद्धव जी ! प्रेमी के चरण रज !

39_B_2_n_अपराधी ? बुराई छोड़ना भलाई का मूल है !अपना है, अपने में है, अभी है, समर्थ है , अद्वितीय है , ये ५  बातें मानने के बाद ही भजन होगा ! 

40_A_+_40_B_1_प्रारब्ध और पुरुषार्थ ? सबसे बड़ा पुरुषार्थ ? बुराई रहित होना ! अप्रयत्न होना ! “मैं” शरीर में नहीं हूँ !  भाई जी , जिन्ना ! इन्द्रिय दृष्टि ? बुद्धि दृष्टि  ?  ज्ञान का प्रकाश ?

40_B_2_n_मीरां ! अधिकार का त्याग , साधन के अभिमान  का त्याग ! परकीया भाव !  अंतिम  संस्कार ! देवकी जी का प्रश्न !

41_A_+_41_B_1_अच्छे आदमी की आवश्यकता ! जिसको खुद की आवश्यकता  महसूस नहीं होती उसकी समाज को आवश्यकता होती है ! 

41_B_2_n_अपनी मांग का ठीक ठीक अनुभव करना ! सेवा कैसे करनी है ? किसी को बुरा न समझना ! अचाह होने से संसार की सेवा होने लगती है ! 

42_A_+_42_B_a_n_हम लोगो के बीच अनेक भेद हो सकते है, लेकिन प्रीति का भेद नहीं हो सकता !दर्शन में भेद हो सकते है लेकिन जीवन में भेद नहीं है |

42_B_b_n_साधन जीवन है और जीवन साधन है, साधन और जीवन का विभाजन असाधन है !

60_A_n_मजहब के रहते हुए भी बुराई नहीं मिटी, शासन के रहते हुए भी बुराई नहीं मिटी, फिर भी हम गुरु बनने की सोचते हैं, शासक बनना चाहते हैं तो ये सुधार की बात है कि भोग का एक तरीका है !!

भक्ति

7_A_+7_B_तीन प्रकार की लीलाएं – कुछ वन की, कुछ बृज की और कुछ निकुंज की ! न्याय और प्रेम एक साथ कैसे हो सकता है ? कथा , श्रुति, पुराण ? बृज के रस – सख्य, वात्सल्य और मधुर (परकिया) भाव !  पूतना ! बछड़े ! राधा ! गोपी ! उद्धव !

24_A_+_24_B_प्रेम की प्राप्ति में ही जीवन की पूर्णता है !  प्रेम की प्राप्ति में कोई वस्तु, अवस्था, परिस्थिति  हेतु नहीं नहीं है ! कर चोरी, ब्लैक मार्केटिंग ? दुख नाश हो भी जाय, शांति मिल भी जाए, स्वाधीनता मिल भी जाए  तो भी अहम् तो है ?

27_A_+_27_B_ भक्ति ५ बातों से प्राप्त होती है ! मैं प्रभु की जाती का हूँ, उनसे मेरा नित्य सम्बन्ध है, वे अपने हैं, उनसे कुछ नहीं  चाहिए,मेरे  पास जो कुछ है उन्ही का है !

28_B_n_मैं प्रभु का हूँ और प्रभु मेरे है – यह समझने में बड़ी कठिनाई होती है !

29_A_n_प्रभु मेरे अपने हैं, अपने में हैं, अभी हैं, समर्थ हैं, अद्वितीय हैं ! कोई और नहीं है, कोई गैर नहीं है , अपने हैं ! ऐसा विश्वास हो जाए तो हम अभी , अभी भक्त हो जाए !

36_A_n_उन्होंने ज्ञान इसलिए दिया कि मानव स्वाधीन हो कर , अजर अमर हो कर सदा सदा उनको लाड लड़ाता रहे , रस देता रहे !

36_B_n_प्रभु विश्वासी जो ये मानते है कि भगवान् है और अपने हैं वे इस अजन्मा का जन्म  हैं !

39_A_+39+B_1_सती जी ! वैराग्य और परिवार और निकटवर्ती समाज की सेवा प्रह्लाद ! शबरी ! गोपियों का परकीया भाव ! गोपी वस्त्र हरण ! उद्धव जी ! प्रेमी के चरण रज !

40_B_2_n_मीरां ! अधिकार का त्याग , साधन के अभिमान  का त्याग ! परकीया भाव !  अंतिम  संस्कार ! देवकी जी का प्रश्न !

मेरा कुछ नहीं है

3_A_n_मिली हुई वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य मेरी नहीं है, मेरे लिए नहीं है ! मेरा कुछ नहीं है- मुझे कुछ नहीं चाहिये !

10_A_n_अचाह हो जाये-मरने से न डरे | जीते जी मर जाय अमर हो जावे , दिल देवे सो दिलबर को पावे !  हम मिट गए तो नूरे हस्ती नज़र पड़ी, और वीरान हुए तो बस्ती नज़र पड़ी !

11_B_n_स्वधर्म के तीन व्रत ! मेरा कुछ नहीं है , मुझे कुछ नहीं चाहिए और प्रभु ही केवल अपने, अभी है हैं अपने में है ! इन व्रत को अपनाने में मानव स्वतंत्र है !

परिस्थिति 

8_B_n_परिस्थिति प्राकृतिक न्याय है प्राप्त परिस्थिति के सदुपयोग से अविनाशी स्वाधीन जीवन  !

20_A_+_20_B_हमसे सबसे बड़ी भूल ये  होती है की हम परिस्थिति को ही जीवन मान लेते है ! विकास में हेतु दुख है !

बुराई रहित होना

6_A_+6_B_योग-बोध-प्रेम ये तीन एक है, ये एक तीन है ! बुराई का मूल है सुख लोलुपता ! सुख लोलुपता याने पराधीनता सहन करना ! क्या हम अपने दृष्टि में भले हैं की नहीं, स्वाधीन हैं की नहीं , प्रेमी हैं की नहीं ?

32_A_+_32_B_प्राणी वर्तमान में निर्दोष है, अपने पर न्याय करे, क्षमा नहीं  ! किसी को बुरा न समझे, उस पर न्याय नहीं , क्षमा करे, विवेक सम्मत न होने पर असहयोग करे, क्षमा मांगे एवं प्रभु के नाते अपना माने तथा उसकी सेवा करें ! 

40_A_+_40_B_1_प्रारब्ध और पुरुषार्थ ? सबसे बड़ा पुरुषार्थ ? बुराई रहित होना ! अप्रयत्न होना ! “मैं” शरीर में नहीं हूँ !  भाई जी , जिन्ना ! इन्द्रिय दृष्टि ? बुद्धि दृष्टि  ?  ज्ञान का प्रकाश ?

सत्य

2_B_n_जीवन का सत क्या है ? असत का सदुपयोग करना चाहिए ! हरि आश्रय और विश्राम !

9_A_+9_B_जो हमारे अपने ज्ञान से  तथा आस्था से सिद्ध है वही सत्य है !