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“हर भज सब तज”

हर (हरि / ईश्वर को) भज (सदा याद रख) , सब ( सब कुछ / सब इच्छाएं ) तज (त्याग दे) !

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Vastavik Rashtra Nirman 1 Vastavik Rashtra Nirman 2 Vastavik Rashtra Nirman 3 Vastavik Rashtra Nirman 4 Vastavik Rashtra Nirman 5 Vastavik Rashtra Nirman 6 Vastavik Rashtra Nirman 7

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सत्य अनन्त है ,

पुस्तक आदि में सीमित नहीं हो सकता ,

सत्य अपना परिचय देने में

स्वयं स्वतन्त्र है !

 

 

 

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यह विचार है, उस सन्त के जो पुस्तक या लेख में अपना नाम एवं फोटो छपवाने से संकोच करते थे, क्योंकि वे सत्य  की आवाज को नाम रूप आदि में आबद्ध नहीं करना चाहते थे! | क्योंकि  उनका यह विचार है कि नाम के आधार पर जो बात चलती है, वह कालान्तर में खत्म हो जाती है और नाम के साथ राग-द्वेष का होना स्वभाविक  है । इसलिए  सार्वभौम सत्य के प्रकाशन के साथ नाम न दिया जाय तो अच्छा है । इसके अतिरिक्त विचार तो अनन्त की विभूति  है, किसी व्यक्ति की निजी विशेषता नहीं । अतः विचारों का प्रकाशन तो अनन्त की अहैतु की कृपा से होता है, उसके साथ किसी व्यक्ति विशेष का नाम जोङ देने से प्रमाद होता है। इसमें  दूसरी एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि, उन  सन्त के विचारानुसार देश, काल, मत, मजहब, सम्प्रदाय एवं वर्ग निर्पेक्ष जीवन का जो सत्य है, उसे व्यक्ति  के माध्यम से प्रकट करना उसका मूल्य घटाना है और सबसे बड़ी बात यह है कि जिन्होने परम-प्रेमास्पद की सत्ता  से भिन्न अपना अस्तित्व ही  नहीं रखा, वे अपने नाम के माध्यम से कोई बात कैसे कह सकते थे !